
शरद कटियार
प्रयागराज में शंकराचार्य से जुड़ा प्रकरण अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है। यह मामला धर्म, सत्ता और व्यवस्था के त्रिकोण में फंसा ऐसा सवाल बन चुका है, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक कार्यशैली दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जिस प्रयागराज को सनातन परंपरा, संत-संन्यास और धर्माचार्यों की राजधानी माना जाता है, वहीं शंकराचार्य जैसे सर्वोच्च धार्मिक पद से जुड़ा विवाद यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर शासन-प्रशासन किस दिशा में जा रहा है।
सबसे बड़ा और असहज सवाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुप्पी को लेकर है। क्या यह मौन किसी गहरी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, या फिर यह संकेत है कि अफसरशाही अब राजनीतिक नेतृत्व से आगे निकल चुकी है?
शंकराचार्य कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक परंपरा, एक विचार और वेदांत की जीवंत धारा हैं। ऐसे में उनसे जुड़ा कोई भी सरकारी कदम केवल कानूनी नजरिए से नहीं देखा जा सकता। कानून का पालन आवश्यक है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या प्रशासन ने संवाद, सम्मान और संतुलन का रास्ता चुना?
नोटिस, प्रतिबंध और औपचारिक कार्रवाइयों की खबरों ने यह संदेश दिया कि अधिकारियों ने संवेदनशीलता से ज्यादा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना जरूरी समझा। धर्माचार्यों से जुड़े मामलों में यदि पहली भाषा संवाद की जगह आदेश बन जाए, तो टकराव स्वाभाविक है।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की पहचान एक ऐसे मुख्यमंत्री की रही है, जो मठ-मंदिर, साधु-संत और सनातन परंपरा पर खुलकर बोलते हैं। ऐसे में प्रयागराज जैसे धार्मिक केंद्र में शंकराचार्य प्रकरण पर उनकी चुप्पी असामान्य लगती है।यह चुप्पी दो संभावनाएं पैदा करती है।पहली—यह एक सोची-समझी हाईटेक राजनीतिक रणनीति हो सकती है, जिसमें सीधे हस्तक्षेप से बचकर मामला प्रशासन पर छोड़ दिया गया हो, ताकि विवाद सीमित रहे।दूसरी—यह संकेत भी हो सकता है कि अफसरशाही इतनी ताकतवर हो चुकी है कि राजनीतिक नेतृत्व भी फिलहाल उसे खुली छूट देने को मजबूर है।
यदि दूसरी संभावना सच है, तो यह स्थिति बेहद गंभीर है।
प्रयागराज जैसे शहर में, जहां हर निर्णय आस्था से जुड़ा होता है, वहां फाइलों के आधार पर लिए गए फैसले अक्सर आग में घी डालने का काम करते हैं। इस प्रकरण में अधिकारियों का ‘खेल’ साफ नजर आता है—कानून की आड़ में ताकत दिखाना और ऊपर से मौन स्वीकृति का आभास।
यह पहला मौका नहीं है जब संवेदनशील मामलों में अफसरशाही ने अति उत्साह दिखाया हो। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार राजनीतिक नेतृत्व की ओर से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश सामने नहीं आया। जब ऐसा होता है, तो अधिकारी खुद को ही अंतिम सत्ता मानने लगते हैं।
प्रयागराज केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। यहां लिया गया हर फैसला पूरे देश में संदेश देता है। शंकराचार्य प्रकरण में अब भी समय है कि सरकार साफ करे—
क्या यह अधिकारियों की मनमानी थी,या फिर सरकार की मौन स्वीकृति से खेला गया प्रशासनिक खेल?
संपादकीय रूप में यह कहना आवश्यक है कि शासन केवल कानून से नहीं चलता, परंपरा और आस्था भी उसकी अहम धुरी होती है। यदि सरकार संतों और समाज के बीच भरोसा खो देगी, तो उसका खामियाजा राजनीति को भी भुगतना पड़ेगा।
आज सवाल यह नहीं है कि शंकराचार्य सही हैं या प्रशासन—सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश में सत्ता संतुलन में है?
अगर मुख्यमंत्री की चुप्पी लंबी होती गई, तो इतिहास इसे या तो बेलगाम नौकरशाही की मनमानी के रूप में याद रखेगा, या फिर हाईटेक राजनीति में उलझे एक शक्तिशाली मुख्यमंत्री की विवशता के तौर पर।
लेखक दैनिक यूथ इंडिया के प्रधान संपादक हैँ।
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