उत्तर प्रदेश में आगामी जनगणना को लेकर शासन की ओर से जारी की गई अधिसूचना केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि एक स्पष्ट चेतावनी भी है। जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 11 का विशेष उल्लेख कर यह संदेश दिया गया है कि इस राष्ट्रीय दायित्व में बाधा, लापरवाही या उदासीनता अब किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं होगी। तीन साल तक की जेल और एक हजार रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान बताता है कि सरकार इस प्रक्रिया को बेहद गंभीरता से ले रही है।
जनगणना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार स्तंभ होती है। इसी के आंकड़ों पर यह तय होता है कि किस क्षेत्र को कितनी योजनाएं मिलेंगी, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार और बुनियादी ढांचे के लिए कितने संसाधन आवंटित होंगे। गलत या अधूरी जनगणना का सीधा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है। ऐसे में शासन की यह सख्ती पहली नजर में पूरी तरह जायज प्रतीत होती है।
जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा: जवाबदेही की दिशा में कदम
अधिसूचना की सबसे अहम बात यह है कि मंडल से लेकर तहसील और नगर निकाय स्तर तक जिम्मेदार अधिकारियों की सूची स्पष्ट कर दी गई है। मंडल स्तर पर कमिश्नर, जिला स्तर पर जिलाधिकारी, तहसील स्तर पर उप जिलाधिकारी और तहसीलदार तक की जवाबदेही तय कर दी गई है। नगर निगम, नगर पालिका परिषद, नगर पंचायत, छावनी परिषद और औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में भी इसी तर्ज पर ढांचा तैयार किया गया है।
यह व्यवस्था कागजों पर तो मजबूत दिखती है, लेकिन इसकी असली परीक्षा ज़मीन पर होगी। बीते अनुभव बताते हैं कि कई बार जिम्मेदारी तय होने के बावजूद समन्वय की कमी, तकनीकी दिक्कतें और कर्मचारियों पर अत्यधिक दबाव के कारण लक्ष्य प्रभावित होते हैं।
यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या केवल दंड का भय दिखाकर जनगणना को सफल बनाया जा सकता है? प्रगणक और फील्ड कर्मचारी वही लोग हैं जो पहले से ही चुनाव, टीकाकरण, आपदा प्रबंधन और अन्य सरकारी अभियानों में लगे रहते हैं। यदि उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण, तकनीकी संसाधन और प्रशासनिक सहयोग नहीं मिला, तो सख्त कानून भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे।
मई-जून में प्रस्तावित हाउस सर्वे के दौरान घर-घर जाकर सूचनाएं जुटाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सामाजिक, भाषाई और तकनीकी समस्याएं सामने आती हैं। ऐसे में शासन को चाहिए कि प्रशिक्षण को औपचारिकता न बनाकर व्यावहारिक बनाया जाए और कर्मचारियों की समस्याओं को समय रहते सुलझाया जाए।
जनगणना केवल प्रशासनिक अभ्यास नहीं, बल्कि जनभागीदारी का भी विषय है। आम नागरिकों का सहयोग इसके लिए अनिवार्य है। यदि लोगों में यह धारणा बनी कि जनगणना केवल सरकारी औपचारिकता है या इससे कोई सीधा लाभ नहीं, तो वे जानकारी देने में रुचि नहीं दिखाएंगे। इसलिए सख्ती के साथ-साथ जनजागरूकता अभियान चलाना भी उतना ही जरूरी है।
उत्तर प्रदेश में सरकार की यह पहल यह संकेत देती है कि इस बार जनगणना को हल्के में नहीं लिया जाएगा। लेकिन अंततः सफलता इसी में है कि सख्ती, प्रशिक्षण और जनसहयोग—तीनों का संतुलन बनाया जाए। डर के माहौल में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और विश्वास के साथ यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़े, तभी जनगणना वास्तव में प्रदेश के विकास की मजबूत नींव बन पाएगी।

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