शरद कटियार
प्रयागराज: महाकुंभ–माघ मेले (Maha Kumbh – Magh Mela) की पावन भूमि पर उठा शंकराचार्य (Shankaracharya) का विवाद अब केवल एक संत या एक नोटिस तक सीमित नहीं रहा। यह प्रश्न बन चुका है कि क्या राज्य, प्रशासन या राजनीतिक सत्ता को यह अधिकार है कि वह सनातन परंपरा के शीर्ष धार्मिक पदों की पहचान तय करे? जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मेला प्राधिकरण द्वारा दिया गया नोटिस इसी मूल टकराव को उजागर करता है—परंपरा बनाम सत्ता, आस्था बनाम प्रशासन, और धार्मिक स्वायत्तता बनाम सरकारी नियंत्रण।
शंकराचार्य पद कोई प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि हजार वर्षों से अधिक पुरानी वैदिक–आचार्य परंपरा का संवाहक है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों—ज्योतिष, शारदा (द्वारका), गोवर्धन (पुरी) और श्रृंगेरी—की मान्यता और पारस्परिक स्वीकृति से ही किसी शंकराचार्य की पहचान तय होती रही है। यह व्यवस्था न तो आधुनिक संविधान से जन्मी है, न ही किसी शासनादेश की मोहताज। ऐसे में यदि प्रशासन यह तय करने लगे कि “कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं”, तो यह केवल एक संत को नहीं, पूरी सनातन परंपरा को कटघरे में खड़ा करना है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क इसीलिए गंभीर है। वे कहते हैं कि किसी एक पीठ का निर्णय शेष पीठों की मान्यता से पुष्ट होता है; द्वारका और श्रृंगेरी पीठों के व्यवहारिक समर्थन, तथा पुरी पीठ की “मौन स्थिति” को वे परंपरागत मान्यता के दायरे में रखते हैं। इससे असहमति हो सकती है, पर असहमति का समाधान नोटिस, रोक–टोक और पुलिसिया भाषा नहीं, बल्कि धर्माचार्यों के बीच संवाद और न्यायालयी प्रक्रिया से होना चाहिए।
राज्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपीलों का हवाला देकर “किसी भी प्रकार के प्रचार–आयोजन” पर रोक की बात कहना, प्रशासनिक सतर्कता हो सकती है; पर उसी के समानांतर संत की पालकी रोकना, शिष्यों के साथ अभद्रता और संगम स्नान जैसे आस्था–कर्म से वंचित करना—ये कदम सत्ता के विवेक पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। आस्था के स्थल पर ‘नियंत्रण’ और ‘सम्मान’ के बीच की महीन रेखा यदि लांघी जाए, तो टकराव स्वाभाविक है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया ने इस बहस को और धार दी है। कांग्रेस ने इसे सनातन परंपरा पर हमला बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 25–26 की याद दिलाई—धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता। वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का फोन–संवाद यह संकेत देता है कि मामला केवल धार्मिक नहीं, सामाजिक–राजनीतिक संवेदनशीलता का भी है। सत्ता पक्ष के लिए यह आत्ममंथन का क्षण होना चाहिए कि धार्मिक आस्था के प्रश्नों पर प्रशासनिक कठोरता राजनीतिक लाभ तो दे सकती है, पर सामाजिक विश्वास को क्षति पहुँचा देती है।
यह भी स्मरणीय है कि न्यायालयों में लंबित विवाद का अर्थ यह नहीं कि परंपरा स्थगित हो जाती है। अदालतें अधिकार–सीमाएँ तय करती हैं; परंपराएँ समाज के विवेक से चलती हैं। दोनों के बीच संतुलन ही लोकतंत्र की कसौटी है। यदि प्रशासन को किसी गतिविधि पर आपत्ति है, तो स्पष्ट, सम्मानजनक और न्यूनतम हस्तक्षेप के साथ संवाद–आधारित समाधान खोजा जाना चाहिए—न कि ऐसे कदम, जिनसे ‘राज्य बनाम संत’ का आख्यान बने।
अंततः प्रश्न यही है: क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ आस्था के शिखर पदों की पहचान भी सरकारी फाइलों से तय होगी? या फिर संविधान की आत्मा के अनुरूप राज्य धर्म से समान दूरी रखते हुए परंपराओं की स्वायत्तता का सम्मान करेगा? प्रयागराज का यह विवाद चेतावनी है—यदि सत्ता ने परंपरा की गरिमा नहीं समझी, तो आस्था का आक्रोश किसी एक मेले तक सीमित नहीं रहेगा।
निष्कर्षतः, शंकराचार्य का प्रश्न कानून से भागता नहीं, पर कानून भी परंपरा पर हावी नहीं हो सकता। समाधान टकराव में नहीं, संवाद में है—धर्माचार्यों के बीच, और राज्य व समाज के बीच। यही सनातन की मर्यादा है, और यही लोकतंत्र की भी।


