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Friday, January 23, 2026

नई आमद- “सिनेमा के मुद्दे और मुद्दों का सिनेमा”

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समकालीन हिंदी आलोचना में सिनेमा पर गंभीर, शोधपरक और सामाजिक सरोकारों (Research and social concerns) से जुड़ी पुस्तकों की संख्या अपेक्षाकृत सीमित है। ऐसे परिदृश्य में शिवानी राकेश की पुस्तक “सिनेमा के मुद्दे और मुद्दों का सिनेमा” एक महत्त्वपूर्ण और सार्थक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह कृति सिनेमा को केवल मनोरंजन का माध्यम मानने के बजाय उसे समाज की अंतर्धाराओं, अंतर्विरोधों और वैचारिक संघर्षों का सशक्त प्रतिबिंब मानकर पढ़ने का आग्रह करती है।

पुस्तक का केंद्रीय प्रतिपाद्य सिनेमा और समाज के बीच के द्वंद्वात्मक संबंध को रेखांकित करना है। लेखिका यह स्पष्ट करती हैं कि सिनेमा न केवल समाज से अपने विषय और मुद्दे ग्रहण करता है, बल्कि वह स्वयं भी सामाजिक विमर्श का निर्माण करता है। सत्ता, बाजार और विचारधारा के दबावों के बीच सिनेमा किस प्रकार अपने स्वर और अभिव्यक्तियाँ गढ़ता है—कहीं प्रतिरोध के रूप में, तो कहीं यथास्थिति को सुदृढ़ करने वाले उपकरण के रूप में—इस प्रक्रिया का सूक्ष्म विश्लेषण पुस्तक का प्रमुख वैशिष्ट्य है।

शिवानी राकेश की आलोचनात्मक दृष्टि का सबसे सशक्त पक्ष यह है कि वे सिनेमा को वर्ग, जाति, जेंडर, हाशिए और सत्ता संरचनाओं के संदर्भ में पढ़ती हैं। उनकी विवेचना यह उजागर करती है कि मुख्यधारा का सिनेमा प्रायः सामाजिक असमानताओं को रोमानी और ग्लैमरयुक्त आवरण में ढक देता है, जबकि समानांतर या वैकल्पिक सिनेमा इन्हीं असमानताओं को प्रश्नांकित करता है। लोकप्रिय फिल्मों के साथ-साथ गंभीर और वैचारिक सिनेमा के उदाहरणों के माध्यम से लेखिका इस अंतर को प्रभावी ढंग से रेखांकित करती हैं।

पुस्तक की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और विचारोत्तेजक है। अकादमिक अनुशासन में रहते हुए भी यह कहीं बोझिल नहीं होती। सैद्धांतिक अवधारणाओं को जटिल शब्दावली में उलझाने के बजाय लेखिका उन्हें ठोस उदाहरणों और संदर्भों के सहारे स्पष्ट करती हैं। यही कारण है कि यह पुस्तक शोधार्थियों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से पठनीय और उपयोगी बन जाती है।

इस पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह सिनेमा को केवल फिल्मी परदे तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसके सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करती है। सिनेमा किस प्रकार जनमानस को प्रभावित करता है, रूढ़ियों का निर्माण या विघटन करता है, और राजनीतिक-सांस्कृतिक चेतना को दिशा देता है—इन प्रश्नों पर लेखिका की टिप्पणियाँ गहन और विचारोत्तेजक हैं। विशेष रूप से स्त्री-प्रतिनिधित्व और हाशिए पर खड़े समुदायों की प्रस्तुति पर किया गया विश्लेषण पुस्तक को वैचारिक रूप से और अधिक समृद्ध बनाता है।

हालाँकि, कुछ अध्यायों में यह महसूस होता है कि कुछ विषयों पर और विस्तार की गुंजाइश थी। कई स्थानों पर पाठक की जिज्ञासा गहराती है, किंतु अध्याय अपेक्षाकृत संक्षेप में समाप्त हो जाते हैं। इसके बावजूद यह कमी पुस्तक की समग्र गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करती, बल्कि भविष्य के शोध और विमर्श के लिए नए द्वार खोलती है।

आलोचना की दृष्टि से यह पुस्तक केवल फिल्मों की समीक्षा नहीं है, बल्कि अपने समय का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज़ भी है। सिनेमा के माध्यम से यह कृति हमारे दौर की सामाजिक संरचनाओं, वैचारिक संघर्षों और परिवर्तनशील प्रक्रियाओं को समझने का अवसर प्रदान करती है। शिवानी राकेश की यह पुस्तक सिनेमा अध्ययन को हिंदी साहित्यिक आलोचना के व्यापक फलक से जोड़ती है, जो इसे विशिष्ट और उल्लेखनीय बनाती है।

निष्कर्षतः, “सिनेमा के मुद्दे और मुद्दों का सिनेमा” हिंदी में सिनेमा संबंधी आलोचनात्मक साहित्य की परंपरा को समृद्ध करने वाली एक महत्त्वपूर्ण कृति है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जो सिनेमा को केवल दृश्य-श्रव्य अनुभव नहीं, बल्कि एक सामाजिक पाठ (Social Text) के रूप में पढ़ना और समझना चाहते हैं। संतुलित विवेचन, वैचारिक स्पष्टता और संवेदनशील दृष्टि के कारण यह पुस्तक समकालीन हिंदी आलोचना में अपना विशिष्ट स्थान बनाती है। इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए लेखिका शिवानी राकेश हार्दिक बधाई की पात्र हैं।

पुस्तक : सिनेमा के मुद्दे और मुद्दों का सिनेमा
लेखिका : शिवानी राकेश
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली
वर्ष : 2026
मूल्य : ₹350
समीक्षक : डॉ. सन्तोष पटेल, नई दिल्ली

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