यूथ इंडिया

सनातन परंपरा को समझने की सबसे बड़ी भूल यही होती है कि हम पद और व्यक्ति को एक मान लेते हैं। जबकि शंकराचार्य परंपरा में यह अंतर ही उसकी महानता का आधार है।
शंकराचार्य कोई व्यक्ति नहीं, एक पद है—ऐसा पद, जिसे धारण करने वाला स्वयं को नहीं, बल्कि परंपरा, शास्त्र और मर्यादा को सामने रखता है।
शिव के ज्ञान-तत्त्व का प्रतिनिधि पद
यह पद शिव के ज्ञान-तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ शिव किसी रूप या मूर्ति तक सीमित नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, वैराग्य और अज्ञान-नाश का तत्त्व हैं। शंकराचार्य का कार्य इस तत्त्व को शास्त्रसम्मत ढंग से समाज तक पहुँचाना है—न कि स्वयं को ईश्वर घोषित करना।
शंकराचार्य पद का मूल दायित्व है—वेदांत की शुद्ध, अविचल और अविकृत व्याख्या।
यह पद लोकप्रियता, सत्ता या तात्कालिक दबावों से संचालित नहीं होता; इसके निर्णय वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता पर आधारित होते हैं। यही कारण है कि यह पद समय के साथ बहता नहीं, बल्कि समय को दिशा देता है।
सनातन धर्म मर्यादा-प्रधान संस्कृति है। जब परंपरा दिखावे में बदलने लगे या भावुकता विवेक पर हावी हो जाए, तब शंकराचार्य परंपरा संयम, संतुलन और सत्य की याद दिलाती है। यह पद धर्म की रक्षा करता है—नारों से नहीं, शास्त्रीय अनुशासन से।
इसीलिए कहा जाता है—शंकराचार्य शंकर के “सिंहासन” पर बैठता है, शंकर स्वयं नहीं बन जाता।यह कथन अहंकार के निषेध और दायित्व के स्वीकार का प्रतीक है। व्यक्ति बदलता है, पद नहीं; शरीर नश्वर है, परंपरा कालजयी।
शंकराचार्य को व्यक्ति मानना विवाद पैदा कर सकता है, पर पद के रूप में समझना उसे सभ्यता का स्तंभ बनाता है।यह पद शिव-ज्ञान का प्रतिनिधि, वेदांत का संरक्षक और सनातन मर्यादा का प्रहरी है—यही इसकी विशिष्टता और गरिमा है।

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