
शरद कटियार
प्रयागराज की घटना को यदि केवल एक संत के साथ हुए दुर्व्यवहार तक सीमित करके देखा जाए, तो उसका अर्थ अधूरा रह जाएगा। वास्तव में यह मामला शंकराचार्य परंपरा का है—उस परंपरा का, जिसने भारत को बौद्धिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दिशा दी। हाल ही में प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ घटित कथित घटनाक्रम इसलिए अधिक गंभीर हो जाता है, क्योंकि यहां प्रश्न व्यक्ति का नहीं, आचार्य पद और शंकराचार्य की मर्यादा का है।जहाँ रथ घसीट दिया गया, छत्र तोड़ दिया गया, ऐसा इतिहास में कभी किसी अक्रांता, और किसी मुगलिया सल्तनत के शासक नें भी न किया, और भारत में मौजूदा केंद्र सरकार के मुखिया तो मंझे हुए सनातनी हैं, जबकि यूपी के सी एम खुद एक संत की श्रेणी में आते हैं।
शंकराचार्य पद कोई साधारण धार्मिक पद नहीं है। आदि शंकराचार्य ने जब चार मठों की स्थापना की, तो उनका उद्देश्य केवल पूजा-पद्धति स्थापित करना नहीं था, बल्कि राष्ट्रव्यापी वैचारिक एकता खड़ी करना था। शंकराचार्य सदियों से सनातन धर्म के बौद्धिक मार्गदर्शक, शास्त्रीय निर्णायक और नैतिक संदर्भ रहे हैं। ऐसे में किसी शंकराचार्य का सार्वजनिक अपमान केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सभ्यतागत चोट माना जाता है।
शंकराचार्य का छत्र केवल एक भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि आचार्य पद की गरिमा का प्रतीक है। उसका टूटना या अपमानित होना इस बात का संकेत देता है कि व्यवस्था ने उस प्रतीकात्मक सम्मान को समझने में चूक की। इसी तरह, शिष्यों के साथ कथित दुर्व्यवहार इस घटना को और गहरा बना देता है, क्योंकि सनातन परंपरा में शिष्य पर हाथ उठाना गुरु पर आघात माना जाता है।
लोकतंत्र में शंकराचार्य की स्थिति
लोकतंत्र का अर्थ केवल अधिकारों की गणना नहीं, बल्कि सम्मान और संवाद की संस्कृति भी है। जब एक शंकराचार्य को अपनी बात रखने के लिए धरने पर बैठना पड़े, तो यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं संस्थागत संवेदनशीलता कमजोर पड़ रही है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि शंकराचार्य की बात सुनने के लिए धरना जरूरी हो जाए, तो आम नागरिक की स्थिति क्या होगी?
इतिहास से तुलना क्यों उभरी
जब संत समाज यह कहता है कि “ऐसा व्यवहार मुगल काल में भी नहीं हुआ,” तो यह केवल अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि आक्रोश से उपजी चेतावनी है। इतिहास में सत्ता और धर्म के टकराव रहे हैं, लेकिन आधुनिक भारत में ऐसी तुलना का सामने आना बताता है कि विश्वास का ताना-बाना कमजोर हो रहा है। शंकराचार्य परंपरा का अपमान उस ऐतिहासिक स्मृति को झकझोर देता है, जिसमें यह पद सदैव सम्मान के केंद्र में रहा।
शंकराचार्य की भूमिका आज
आज का शंकराचार्य केवल वेदांत का व्याख्याता नहीं, बल्कि सामाजिक विवेक का भी प्रतिनिधि है। गौ-रक्षा, सांस्कृतिक पहचान, नैतिक मूल्यों और सामाजिक दिशा जैसे विषयों पर शंकराचार्य की भूमिका मार्गदर्शक रही है। ऐसे में उनके साथ जुड़ा कोई भी विवाद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श को प्रभावित करता है।
राज्य की जिम्मेदारी,राज्य का कर्तव्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि संवैधानिक सम्मान सुनिश्चित करना भी है। शंकराचार्य जैसे पद के साथ घटित किसी भी घटना में त्वरित, पारदर्शी और निष्पक्ष कार्रवाई अपेक्षित होती है—ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि भारत में आचार्य परंपरा का सम्मान अपरिवर्तनीय है।
प्रयागराज की घटना को एक चेतावनी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। यह चेतावनी है कि यदि शंकराचार्य परंपरा की मर्यादा को समझने और सम्मान देने में चूक हुई, तो समाज और राज्य के बीच अविश्वास की खाई गहरी होगी।
शंकराचार्य कोई व्यक्ति नहीं, संस्कृति का पद हैं। उस पद का सम्मान सुरक्षित रहेगा, तभी सनातन परंपरा और लोकतांत्रिक मूल्यों—दोनों की गरिमा बनी रह सकेगी।






