पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से जटिल, भावनात्मक और क्षेत्रीय अस्मिता से गहराई से जुड़ी रही है। ऐसे राज्य में भारतीय जनता पार्टी द्वारा ‘बिहार मॉडल’ को लागू करने का फैसला केवल एक चुनावी तैयारी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक प्रयोग भी है। बिहार भाजपा के सात वरिष्ठ प्रदेश पदाधिकारियों को बंगाल भेजे जाने का निर्णय इस बात का संकेत है कि पार्टी इस बार चुनाव को केवल स्थानीय समीकरणों पर नहीं, बल्कि एक परीक्षित संगठनात्मक ढांचे के आधार पर लड़ना चाहती है।
बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जिस तरह केंद्रित रणनीति, स्पष्ट नेतृत्व, बूथ स्तर की मज़बूती और सहयोगी दलों के साथ संतुलन साधा था, उसने पार्टी को राजनीतिक लाभ दिलाया। उसी अनुभव को पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में दोहराने की कोशिश की जा रही है। सवाल यह है कि क्या बिहार में कारगर रही रणनीति बंगाल की ज़मीनी हकीकत में भी उतनी ही प्रभावी साबित होगी?
बिहार मॉडल की मूल भावना
बिहार मॉडल केवल नेताओं की तैनाती नहीं, बल्कि माइक्रो मैनेजमेंट की राजनीति है। इसमें बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की जवाबदेही, मतदाता संपर्क अभियान, सामाजिक समीकरणों की पहचान और संगठन के भीतर अनुशासन पर विशेष ज़ोर दिया जाता है। पांच नेताओं को लोकसभा क्षेत्र प्रभारी बनाना इसी सोच को दर्शाता है कि चुनावी लड़ाई ऊपर से नहीं, बल्कि ज़मीन से लड़ी जाएगी।
हालांकि पश्चिम बंगाल की सामाजिक और राजनीतिक संरचना बिहार से अलग है। यहाँ क्षेत्रीय अस्मिता, सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक राजनीति का प्रभाव अधिक है। ऐसे में बाहरी रणनीति को लागू करना जोखिम भरा भी हो सकता है। स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल, भाषा और संस्कृति की समझ तथा क्षेत्रीय मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता—ये सभी कारक इस रणनीति की सफलता तय करेंगे।
भाजपा का यह कदम इस बात का भी संकेत देता है कि पार्टी नेतृत्व चुनाव को व्यक्तिगत चेहरों से अधिक संगठनात्मक ताक़त के सहारे लड़ना चाहता है। यह दृष्टिकोण दीर्घकालिक रूप से पार्टी को मज़बूत कर सकता है, लेकिन तत्काल चुनावी लाभ के लिए स्थानीय नेतृत्व को भी समान महत्व देना होगा।
बिहार के नेताओं को बंगाल में भेजना केवल आंतरिक संगठनात्मक फैसला नहीं है, बल्कि इसका एक राजनीतिक संदेश भी है—भाजपा अब राज्यों के बीच अपने सफल चुनावी मॉडल साझा करने की नीति पर आगे बढ़ रही है। यह पार्टी को एक राष्ट्रीय संगठन के रूप में मज़बूती देता है, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय दलों को यह अवसर भी देता है कि वे इसे “बाहरी हस्तक्षेप” के रूप में प्रस्तुत करें।
पश्चिम बंगाल में ‘बिहार स्ट्रैटेजी’ अपनाना भाजपा के लिए अवसर भी है और जोखिम भी। यदि यह रणनीति स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाली गई, तो यह पार्टी को निर्णायक बढ़त दिला सकती है। लेकिन यदि इसे यांत्रिक तरीके से लागू किया गया, तो यह प्रयोग उलटा भी पड़ सकता है।
आख़िरकार, चुनाव केवल रणनीतियों से नहीं जीते जाते—वे जनता के विश्वास, ज़मीनी जुड़ाव और स्थानीय संवेदनशीलता से जीते जाते हैं। आने वाले महीने तय करेंगे कि बिहार का अनुभव बंगाल की राजनीति में इतिहास बनता है या केवल एक प्रयोग बनकर रह जाता है।






