डॉ आशीष यादव
भारत में सेक्स शिक्षा आज भी सामाजिक वर्जनाओं की कैद में है। यह चुप्पी केवल संस्कृति की रक्षा नहीं कर रही, बल्कि युवाओं को अज्ञान, भय और गलत जानकारी की ओर धकेल रही है। सवाल यह नहीं कि सेक्स शिक्षा दी जाए या नहीं, सवाल यह है कि इसके अभाव में हो रहे नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
सेक्स शिक्षा को केवल शारीरिक संबंधों तक सीमित कर देना सबसे बड़ी भूल है। यह शिक्षा शरीर के विकास, हार्मोनल बदलाव, भावनात्मक समझ, सहमति, सुरक्षा, सम्मान और जिम्मेदारी से जुड़ी है। किशोरावस्था में शरीर और मन में आने वाले बदलाव यदि समझाए न जाएँ, तो युवा खुद को दोषी और भ्रमित महसूस करता है।
जब परिवार और स्कूल इस विषय पर चुप रहते हैं, तब इंटरनेट, अश्लील वीडियो और अफवाहें युवाओं के शिक्षक बन जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि युवा संबंधों को उपभोग की वस्तु समझने लगता है।
यौन अपराध, अवांछित गर्भधारण, यौन रोग और मानसिक तनाव इसी अज्ञान की देन हैं।
सहमति और सम्मान की शिक्षा
सेक्स शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है सहमति । बिना सहमति कोई भी संबंध अपराध है—यह समझ समाज में आज भी कमजोर है। सही शिक्षा युवाओं को दूसरों की सीमाओं का सम्मान करना सिखाती है।
परिवार और स्कूल की जिम्मेदारी
माता-पिता का मौन बच्चों को सुरक्षित नहीं बनाता, बल्कि असुरक्षित करता है। संवाद ही सुरक्षा है।
स्कूलों में वैज्ञानिक, उम्र के अनुसार और नैतिक मूल्यों से जुड़ी सेक्स शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।
यह धारणा कि सेक्स शिक्षा से युवा भटकते हैं, पूरी तरह गलत है। शोध बताते हैं कि जहाँ सही सेक्स शिक्षा दी जाती है, वहाँ यौन अपराध और असुरक्षित व्यवहार कम होता है।
निष्कर्षतः, सेक्स शिक्षा अश्लीलता नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सुरक्षा और संस्कारों की शिक्षा है।
यदि समाज आज भी चुप रहा, तो आने वाली पीढ़ी इसकी भारी कीमत चुकाएगी।

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