शरद कटियार
नगीना से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद की हालिया राजनीतिक गतिविधियाँ और बयान उत्तर प्रदेश की सियासत में एक नए विमर्श को जन्म दे रहे हैं। नबी की शान से जुड़े मुद्दे पर उनकी मुखर प्रतिक्रिया ने यह सवाल केंद्र में ला दिया है कि क्या उनकी राजनीति अब केवल दलित अस्मिता तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि वह बहुजन राजनीति के व्यापक विस्तार की ओर बढ़ रही है।
चंद्रशेखर आज़ाद की राजनीतिक यात्रा दलित आंदोलन से शुरू होकर संसद तक पहुँची है। सहारनपुर आंदोलन ने उन्हें एक आक्रामक, जमीनी और प्रतिरोध की राजनीति करने वाले नेता के रूप में स्थापित किया। उनकी पहचान संविधान, सामाजिक न्याय और आरक्षण की रक्षा करने वाले नेता की रही है। यही कारण है कि वे दलित समाज के बीच एक भरोसेमंद चेहरा बने।
लेकिन राजनीति स्थिर नहीं रहती। समय, परिस्थितियाँ और सामाजिक यथार्थ नेताओं को अपने दायरे विस्तार करने के लिए प्रेरित करते हैं। हाल के महीनों में आज़ाद के भाषणों और बयानों में अल्पसंख्यक मुद्दों, विशेषकर मुस्लिम समाज की चिंताओं पर स्पष्ट संवेदनशीलता दिखाई देती है। इसे कुछ लोग दलित राजनीति से हटकर मुस्लिम सियासत की ओर कदम मान रहे हैं, जबकि समर्थक इसे बहुजन एकता की स्वाभाविक प्रक्रिया बताते हैं।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना यह बताती है कि दलित और मुस्लिम समुदाय, दोनों ही ऐतिहासिक रूप से सत्ता के केंद्र से दूर रहे हैं। दोनों वर्गों के अनुभव अलग हैं, लेकिन पीड़ा, भेदभाव और असुरक्षा की भावना कई बिंदुओं पर एक-दूसरे से मिलती है। ऐसे में यदि कोई नेता इन दोनों समुदायों के साझा सरोकारों की बात करता है, तो उसे केवल ‘धार्मिक राजनीति’ कहकर खारिज करना भी एकांगी दृष्टि होगी।
हालाँकि यह चिंता भी निराधार नहीं है कि धार्मिक प्रतीकों और भावनात्मक मुद्दों पर अत्यधिक जोर कहीं मूल सामाजिक-आर्थिक सवालों को पीछे न धकेल दे। दलित राजनीति की ताकत उसकी वैचारिक स्पष्टता और संवैधानिक प्रतिबद्धता में रही है। यदि यह धुरी कमजोर पड़ती है, तो राजनीतिक विस्तार के बावजूद वैचारिक खोखलापन पैदा हो सकता है।
चंद्रशेखर आज़ाद के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है—वे बहुजन राजनीति का विस्तार करते हुए भी अपने मूल एजेंडे को कैसे मजबूत रखें। यदि वे दलित मुद्दों के साथ शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और समानता जैसे सवालों पर दलित–मुस्लिम साझा मंच तैयार कर पाते हैं, तो यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया संतुलन पैदा कर सकता है।
निष्कर्षतः, चंद्रशेखर आज़ाद की राजनीति किसी एक समुदाय से दूसरे समुदाय की ओर ‘शिफ्ट’ नहीं, बल्कि प्रभावी हुई तो यह सामाजिक न्याय की राजनीति का विस्तार साबित हो सकती है। यह विस्तार अवसर भी है और जोखिम भी। फैसला आने वाला समय और मतदाता करेंगे कि यह रणनीति बहुजन एकता की मजबूत नींव बनती है या केवल एक चुनावी प्रयोग बनकर रह जाती है।

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