विकास कटियार
इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा सच यह है कि टेक्नोलॉजी और युवा एक-दूसरे के पर्याय बनते जा रहे हैं। आज का युवा डिजिटल दुनिया में जन्म ले रहा है, वहीं सीख रहा है, वहीं सोच रहा है और वहीं सपने भी देख रहा है। टेक्नोलॉजी ने युवाओं को जितनी तेज़ी से आगे बढ़ने का अवसर दिया है, उतनी ही तेज़ी से उसने कई नए संकट भी पैदा किए हैं।
टेक्नोलॉजी ने शिक्षा, रोजगार और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। आज कोई भी युवा मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से देश-दुनिया की श्रेष्ठ शिक्षा तक पहुँच बना सकता है। ऑनलाइन कोर्स, डिजिटल यूनिवर्सिटी, फ्री ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म ने शिक्षा को वर्ग और भूगोल की सीमाओं से मुक्त किया है।
रोजगार के क्षेत्र में भी टेक्नोलॉजी ने युवाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, यूट्यूब, ब्लॉगिंग, डिजिटल पत्रकारिता और आईटी सेक्टर ने परंपरागत नौकरियों की सोच को बदल दिया है। आज युवा नौकरी की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि अवसर स्वयं पैदा कर रहा है।
सोशल मीडिया युवाओं के लिए आवाज़ बना है, लेकिन यही प्लेटफॉर्म भ्रम, तुलना और अवसाद का कारण भी बन रहा है। लाइक, फॉलोअर और व्यूज़ की दौड़ ने आत्म-मूल्य को आभासी मानकों से जोड़ दिया है।
युवा बाहर से खुश दिखता है, लेकिन भीतर से असुरक्षित और अकेला होता जा रहा है।
डिजिटल लत और मानसिक संकट
मोबाइल की लत आज युवाओं की सबसे बड़ी बीमारी बन चुकी है। नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में गिरावट और डिप्रेशन इसके प्रत्यक्ष परिणाम हैं। टेक्नोलॉजी समय बचाने आई थी, लेकिन आज वही समय निगल रही है।
समाधान: तकनीक पर नियंत्रण
समस्या टेक्नोलॉजी नहीं, उसका असंतुलित उपयोग है। युवाओं को डिजिटल साक्षरता, नैतिक शिक्षा और आत्म-अनुशासन सिखाना होगा।टेक्नोलॉजी को साधन बनाया जाए, लक्ष्य नहीं।निष्कर्षतः, टेक्नोलॉजी युवा शक्ति का भविष्य है, लेकिन तभी जब युवा उसके मालिक हों, गुलाम नहीं।

 

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