नई दिल्ली| कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों और अमेरिका-पाकिस्तान के संयुक्त सैन्य अभ्यास को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा निशाना साधा है। उन्होंने इसे भारत की विदेश नीति की विफलता बताते हुए कहा कि ऐसे घटनाक्रम सरकार के आत्मप्रशंसापूर्ण कूटनीतिक दावों की पोल खोलते हैं।
जयराम रमेश ने शनिवार को अमेरिका और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच हुए संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘इंस्पायर्ड गैम्बिट-2026’ का हवाला देते हुए कहा कि यह भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए लिखा कि स्वयं को ‘विश्वगुरु’ कहने वाले भारत की विदेश नीति को एक और झटका लगा है, क्योंकि अमेरिकी केंद्रीय कमान ने पाकिस्तानी सेना के साथ संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास पूरा होने की पुष्टि की है।
कांग्रेस सांसद ने अपनी पोस्ट में यह भी याद दिलाया कि जून 2025 में तत्कालीन अमेरिकी केंद्रीय कमान प्रमुख जनरल माइकल कुरिल्ला ने आतंकवाद विरोधी अभियानों में पाकिस्तान को ‘असाधारण सहयोगी’ बताया था। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की खुले तौर पर प्रशंसा की, जिनकी भड़काऊ टिप्पणियों ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमलों की पृष्ठभूमि तैयार की थी।
जयराम रमेश ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप लगातार यह दावा दोहरा रहे हैं कि उन्होंने 10 मई 2025 को भारत-पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर को रुकवाने के लिए हस्तक्षेप किया था। कांग्रेस नेता के मुताबिक, ऐसे दावे भारत की संप्रभुता और कूटनीतिक स्थिति पर सवाल खड़े करते हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस और स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
इससे एक दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर दोहराया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान, दोनों परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच संभावित युद्ध को रुकवाया। ट्रंप ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उन्हें कम से कम एक करोड़ लोगों की जान बचाने के लिए धन्यवाद दिया था। ट्रंप ने अपने बयान में दावा किया कि बीते एक साल में उन्होंने आठ शांति समझौते कराए और भारत-पाकिस्तान के बीच टकराव को रोककर बड़ी उपलब्धि हासिल की।
कांग्रेस का कहना है कि ट्रंप के बार-बार किए जा रहे ऐसे दावे और अमेरिका-पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य नजदीकियां भारत की विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं और केंद्र सरकार को इस पर देश के सामने स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।






