उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘जनता दर्शन’ को एक संवेदनशील और जवाबदेह शासन का उदाहरण बताने की कोशिश की जाती है। कहा जाता है कि मुख्यमंत्री खुद जनता की समस्याएं सुनते हैं, अधिकारियों को फटकार लगाते हैं और तुरंत समाधान का आदेश देते हैं। लेकिन अगर इस चमकदार तस्वीर के भीतर झांका जाए, तो यह कार्यक्रम संवेदनशील शासन नहीं, बल्कि विफल प्रशासन की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति बनकर सामने आता है।
सबसे बुनियादी सवाल यही है अगर शासन प्रभावी है, तो जनता को बार-बार मुख्यमंत्री के दरबार में क्यों आना पड़ रहा है? अगर थाने, तहसील, नगर निकाय, विकास विभाग, स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग अपने कर्तव्य निभा रहे होते, तो फरियादों की यह भीड़ क्यों लगती?
जनता दर्शन का सबसे खतरनाक संदेश यह है कि समाधान की आखिरी उम्मीद अब मुख्यमंत्री ही हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि पूरा प्रशासनिक ढांचा या तो निष्क्रिय है या जनता का भरोसा खो चुका है। यह किसी मुख्यमंत्री की ताकत नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमजोरी का प्रमाण है।हर हफ्ते सैकड़ों शिकायतें भूमि विवाद, पुलिस उत्पीड़न, अवैध कब्जे, पेंशन, इलाज, नौकरी—यह बताती हैं कि समस्याएं अस्थायी नहीं, बल्कि संरचनात्मक हैं। कैमरे के सामने अधिकारियों को निर्देश देना आसान है, लेकिन उन निर्देशों का पालन जमीन पर क्यों नहीं दिखता—यह सवाल अनुत्तरित रहता है।
आश्वासन की राजनीति, समाधान का अभाव,जनता दर्शन में पीड़ित को अक्सर यह सुनने को मिलता है, “जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी” “अधिकारी जिम्मेदार होंगे”“किसी के साथ अन्याय नहीं होगा”लेकिन यही वाक्य पिछले कई वर्षों से दोहराए जा रहे हैं। अगर हर बार जांच ही करानी पड़ रही है, तो पहले की जांचों का क्या हुआ?अगर हर बार अधिकारियों को चेतावनी ही देनी पड़ रही है, तो निलंबन, बर्खास्तगी और दंड कहां हैं?सख्त शासन का दावा तब खोखला लगता है, जब दोषी अधिकारी सुरक्षित रहते हैं और पीड़ित अगले जनता दर्शन में फिर वही फाइल लेकर खड़ा मिलता है।
धर्म और प्रतीक, शासन पर भारी
योगी सरकार की राजनीति में धर्म, वेश, प्रतीक और छवि को बेहद महत्व दिया गया है। जनता दर्शन में भी यह छवि हावी रहती है। लेकिन धार्मिक प्रतीकों से शासन नहीं चलता, शासन नीतियों, नियमों और निष्पक्ष प्रशासन से चलता है।
विडंबना यह है कि जिस हिंदू समाज को ‘जागा हुआ’ बताया गया, वही समाज आज, थानों में अपमानित हो रहा है, जमीन के लिए दर-दर भटक रहा है,इलाज और रोजगार के लिए गुहार लगा रहा है, अगर यह जागरण है, तो फिर सोना किसे कहते हैं? जनता दर्शन ने शासन को इतना केंद्रीकृत कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो चुकी है। अधिकारी डर के मारे फाइल रोकते हैं, क्योंकि फैसला लेने की हिम्मत नहीं बची। नतीजा—हर मामला ऊपर पहुंचता है, और मुख्यमंत्री मंच बनकर रह जाते हैं।
यह मॉडल अल्पकाल में प्रचार दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह शासन को लकवाग्रस्त कर देता है।
वास्तविक सुधार क्या होता?
अगर योगी सरकार सच में जनता की बार-बार आने की नौबत खत्म करना चाहती, तो उसे थानों और तहसीलों में जवाबदेही तय करनी होती, भ्रष्ट अधिकारियों पर सार्वजनिक कार्रवाई करनी होती शिकायत निस्तारण की समय-सीमा कानूनन लागू करनी होती। मुख्यमंत्री नहीं, सिस्टम को समाधानकर्ता बनाना होता लेकिन ऐसा करने से कैमरे कम होते, और शायद राजनीति को उतना लाभ न मिलता।
‘जनता दर्शन’ को उपलब्धि बताना दरअसल प्रशासनिक विफलता पर परदा डालना है। यह कार्यक्रम बताता है कि उत्तर प्रदेश में जनता को आज भी न्याय के लिए दरबार लगाना पड़ता है—बस दरबार का नाम बदल गया है।
योगी आदित्यनाथ अगर सच में इतिहास में एक कुशल प्रशासक के रूप में दर्ज होना चाहते हैं, तो उन्हें जनता दर्शन से ज्यादा व्यवस्था सुधार दर्शन करना होगा। वरना यह सवाल जनता पूछती रहेगीअगर सब ठीक है, तो हम यहां क्यों खड़े हैं?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here