नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार किए जाने और भ्रष्टाचार जांच के लिए गठित पैनल की वैधता को चुनौती दी थी। शीर्ष अदालत के इस फैसले के साथ ही जस्टिस वर्मा को बड़ी कानूनी राहत मिलने की उम्मीद खत्म हो गई है और महाभियोग से जुड़ी संसदीय प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा की पीठ ने इस मामले में स्पष्ट किया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत राज्यसभा के उपसभापति को सभापति की अनुपस्थिति में कार्य करने का पूरा अधिकार है। पीठ ने कहा कि यह व्यवस्था ठीक उसी तरह है, जैसे राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति उनके दायित्वों का निर्वहन करते हैं। अदालत ने माना कि महाभियोग प्रस्ताव और उससे जुड़ी प्रक्रिया संविधान के दायरे में है और इसमें किसी तरह की अवैधता नहीं पाई गई।
गौरतलब है कि जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने की प्रक्रिया और भ्रष्टाचार की जांच के लिए गठित पैनल संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इसे न्यायिक स्वतंत्रता पर आघात बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 8 जनवरी को सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद सोमवार को अदालत ने दोनों पक्षों को लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। सभी दलीलों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न्यायिक और संवैधानिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे न केवल महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया को मजबूती मिली है, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ है कि संसद और उसके पदाधिकारियों की संवैधानिक भूमिकाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या है।






