लखनऊ| प्रदेश में 1 फरवरी से लागू होने जा रही नई क्षमता आधारित कर व्यवस्था ने पान मसाला और तंबाकू उद्योग के साथ-साथ राज्य सरकार की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। जिस प्रणाली से कर राजस्व में बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही थी, उसके उलट कर संग्रह में और गिरावट की आशंका जताई जा रही है। वित्त विभाग के आकलन के अनुसार, नई व्यवस्था के चलते विशेष रूप से उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां पान मसाला उद्योग का आधार क्षेत्रीय ब्रांड्स हैं, टैक्स कलेक्शन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
वित्त विभाग के मुताबिक पान मसाला और तंबाकू से मिलने वाला कर राजस्व पहले ही करीब 70 प्रतिशत तक गिर चुका है। एक समय जहां यह संग्रह लगभग 1000 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह सिमटकर करीब 300 करोड़ रुपये रह गया है, जबकि खपत में किसी तरह की कमी नहीं देखी गई है। हालात की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्रीय वित्त मंत्री से नई कर व्यवस्था पर पुनर्विचार का आग्रह किया है।
नई प्रणाली में कर निर्धारण मशीन की उत्पादन क्षमता, पाउच के वजन और अधिकतम खुदरा मूल्य से जोड़ा गया है। उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि 500 पाउच प्रति मिनट क्षमता वाली मशीन से 2.5 ग्राम तक का पाउच तैयार किया जाता है, तो उस पर मासिक उपकर करीब 1.1 करोड़ रुपये तय किया गया है। वहीं, मशीन की गति या पाउच का वजन बढ़ते ही कर का बोझ दोगुना होकर लगभग 2.2 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। इस स्थिति में निर्माता न तो पाउच का वजन बढ़ा पा रहे हैं और न ही कीमत में बदलाव कर पा रहे हैं।
नई कर व्यवस्था के चलते पान मसाला का आधार मूल्य 5 रुपये और पाउच का वजन 1 से 1.5 ग्राम के बीच सीमित रहने की संभावना जताई जा रही है। इससे बाजार में मात्रा आधारित प्रतिस्पर्धा लगभग समाप्त होकर केवल गुणवत्ता आधारित प्रतिस्पर्धा रह जाएगी। इसका सीधा असर छोटे और क्षेत्रीय ब्रांड्स पर पड़ने की आशंका है, जो अब तक कम कीमत और अधिक वजन की रणनीति के सहारे बाजार में अपनी जगह बनाए हुए थे।
वित्त विभाग को आशंका है कि यदि क्षेत्रीय ब्रांड्स की बिक्री और मांग में गिरावट आती है, तो इसका सीधा प्रभाव राज्य के कर राजस्व पर पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में पान मसाला और तंबाकू उद्योग राजस्व का एक प्रमुख स्रोत माना जाता है, जिसमें क्षेत्रीय कंपनियों की भूमिका बेहद अहम है। इसी कारण राज्य सरकार ने केंद्र से आग्रह किया है कि फिलहाल इस क्षेत्र में पुरानी कर व्यवस्था को ही जारी रखा जाए। उद्योग जगत का भी मानना है कि नई प्रणाली से न केवल क्षेत्रीय इकाइयों के अस्तित्व पर संकट आएगा, बल्कि समग्र रूप से कर संग्रह में भी और कमी हो सकती है। अब निगाहें केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह निर्णय उद्योग के भविष्य के साथ-साथ राज्य के राजस्व संतुलन के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है

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