संदीप सक्सेना
उप संपादक, यूथ इंडिया न्यूज़ ग्रुप
भारत की सांस्कृतिक आत्मा उसके पर्व-त्योहारों में जीवित रहती है। यहां उत्सव केवल उल्लास का क्षण नहीं होते, बल्कि वे जीवन को समझने, समाज को जोड़ने और प्रकृति से संवाद स्थापित करने के अवसर होते हैं। भारत की यही विशेषता उसे विश्व की प्राचीनतम और जीवंत सभ्यताओं में स्थान दिलाती है। दक्षिण भारत का प्रमुख पर्व पोंगल भी ऐसा ही एक उत्सव है, जो केवल फसल कटाई का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, श्रम और कृतज्ञता के त्रिवेणी संगम का प्रतीक है।
पोंगल हमें यह याद दिलाता है कि आधुनिकता, तकनीक और तेज़ रफ्तार विकास की दौड़ में यदि हम अपनी जड़ों से कट गए, तो वह प्रगति खोखली और अस्थायी साबित होगी। यह पर्व मनुष्य को उसके मूल से जोड़ता है—धरती, सूर्य और परिश्रम से।
पोंगल: उफान केवल अन्न का नहीं, आशा का भी
‘पोंगल’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है उफान—दूध और चावल का उबलकर बाहर आना। किंतु यह उफान केवल पकवान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समृद्धि, संतोष और सकारात्मकता के उफान का प्रतीक है। फसल कटाई के बाद जब किसान की महीनों की मेहनत रंग लाती है और खलिहानों से अन्न घरों तक पहुंचता है, तब यह पर्व कृतज्ञता के भाव के साथ मनाया जाता है।
सूर्य के उत्तरायण होने के साथ पोंगल यह संकेत देता है कि अंधकार के बाद प्रकाश और संघर्ष के बाद सफलता अवश्य आती है। यह संदेश आज के अनिश्चित और प्रतिस्पर्धात्मक दौर में और भी प्रासंगिक हो गया है।
भोगी पोंगल: त्याग से नवसृजन की शुरुआत
पोंगल का पहला दिन भोगी पोंगल कहलाता है। यह दिन केवल पुराने सामान को त्यागने का नहीं, बल्कि पुरानी सोच, नकारात्मकता और जड़ता को छोड़ने का प्रतीक है। लोग अनुपयोगी वस्तुओं को हटाकर स्वच्छ और सकारात्मक वातावरण में नए जीवन की शुरुआत करते हैं।
यह परंपरा गहरे अर्थ समेटे हुए है—यह सिखाती है कि विकास केवल नई चीजें जोड़ने से नहीं, बल्कि अनावश्यक बोझ छोड़ने से भी होता है। जब तक हम अतीत की जकड़न से मुक्त नहीं होंगे, तब तक भविष्य के अवसरों का स्वागत नहीं कर सकते।
सूर्य पोंगल: प्रकृति के साथ सीधा संवाद
दूसरा और मुख्य दिन सूर्य पोंगल होता है। इस दिन सूर्य देव की आराधना की जाती है, जिन्हें जीवन, ऊर्जा और निरंतरता का स्रोत माना गया है। खुले आकाश के नीचे मिट्टी के बर्तन में दूध और चावल उबालकर पोंगल बनाना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ प्रत्यक्ष संवाद है।
यह दृश्य आधुनिक जीवनशैली पर एक मौन प्रश्न भी खड़ा करता है—कि तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, मानव का अस्तित्व आज भी प्रकृति पर ही निर्भर है। जब पर्यावरण असंतुलन और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं विश्व को चुनौती दे रही हैं, तब सूर्य पोंगल हमें प्रकृति के प्रति विनम्रता और सम्मान का भाव सिखाता है।
मट्टू पोंगल: सहअस्तित्व का संदेश
पोंगल का तीसरा दिन मट्टू पोंगल पशुधन को समर्पित होता है। किसान के जीवन में गाय, बैल और अन्य पशुओं की भूमिका केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी होती है। उन्हें सजाया जाता है, पूजा की जाती है और उनके योगदान के लिए धन्यवाद दिया जाता है।
यह पर्व हमें यह सिखाता है कि विकास मानव केंद्रित नहीं, बल्कि सहअस्तित्व आधारित होना चाहिए। जब आज की दुनिया केवल उपभोग और लाभ की भाषा बोल रही है, तब मट्टू पोंगल करुणा, संवेदनशीलता और संतुलन का पाठ पढ़ाता है।
कानूम पोंगल: रिश्तों और समाज की मजबूती
पोंगल का चौथा दिन कानूम पोंगल सामाजिक समरसता और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक है। इस दिन लोग रिश्तेदारों और मित्रों के साथ समय बिताते हैं, प्रकृति के बीच जाकर जीवन की सरल खुशियों को साझा करते हैं।
यह दिन याद दिलाता है कि समाज केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि आपसी संबंधों, विश्वास और सामूहिक आनंद से सशक्त बनता है। तेज़ होती जीवन-शैली में जब रिश्ते औपचारिक होते जा रहे हैं, कानूम पोंगल उन्हें फिर से जीवंत करने का अवसर देता है।
आज के भारत के लिए पोंगल का संदेश
आज के समय में पोंगल केवल एक क्षेत्रीय पर्व नहीं रह गया है। यह पूरे भारत के लिए एक प्रेरक संदेश है—अन्नदाता किसान के सम्मान का संदेश। जब अन्न केवल बाजार की वस्तु बनकर रह जाता है, तब पोंगल हमें उसके पीछे छिपे पसीने, त्याग और संघर्ष का स्मरण कराता है।
युवा पीढ़ी के नाम संदेश
युवा पीढ़ी के लिए पोंगल एक गहन सीख है। भौतिक सफलता और त्वरित उपलब्धियों की दौड़ में यह पर्व धैर्य, संतुलन और कृतज्ञता का मूल्य सिखाता है। यह बताता है कि सच्ची समृद्धि केवल संसाधनों में नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और श्रम के प्रति सम्मान में निहित है।
पोंगल केवल दक्षिण भारत का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का उत्सव है। सूर्य, धरती, किसान और पशुधन—इन चारों के सम्मान में ही जीवन की निरंतरता छिपी है। जब समाज इन मूल्यों को आत्मसात करता है, तभी विकास टिकाऊ, संवेदनशील और समावेशी बनता है।
पोंगल हमें यही सिखाता है—
कृतज्ञ बनिए, प्रकृति से जुड़िए और श्रम का सम्मान कीजिए।।

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