सोशल मीडिया हमेशा ही भ्रम फैलाने का करती रही प्रयास
राजनीतिक घरानों के पीछे राजनीतिक प्रतिद्वंदी पहले भी कर चुके हैं ऐसे प्रयास
फर्रुखाबाद। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे एक वीडियो ने लोकसभा सांसद मुकेश राजपूत को लेकर भ्रम और गलत फहमी की स्थिति पैदा कर दी। वीडियो में दावा किया गया कि सांसद ने कुछ ही वर्षों में मात्र सात लाख रुपये की संपत्ति से अत्यधिक संपत्ति अर्जित कर ली है। हालांकि, जब इस दावे की तथ्यात्मक जांच की गई तो यह स्पष्ट हुआ कि वायरल वीडियो में दर्शाए गए व्यक्ति और सांसद मुकेश राजपूत एक नहीं हैं।
दरअसल, वीडियो में जिस मुकेश राजपूत का विवरण दिखाया गया है, वह अलग व्यक्ति है और उसके पिता का नाम भी सांसद के पिता के नाम से भिन्न है। बावजूद इसके, बिना नाम और पहचान की पुष्टि किए वीडियो को साझा किया गया, जिससे सांसद की छवि को ठेस पहुंचने का षड्यंत्र सामने आ गया है।

पिता के नाम से ही खुल जाती है सच्चाई

वायरल सामग्री में जिस मुकेश राजपूत की संपत्ति का विवरण दिखाया गया है, उसके पिता का नाम अलग दर्ज है, जबकि सांसद मुकेश राजपूत के पिता का नाम सरकारी रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से भिन्न है। यदि वीडियो साझा करने से पहले केवल इस बिंदु पर भी ध्यान दिया जाता, तो यह भ्रम फैलने से रोका जा सकता था।
स्थानीय स्तर पर यह भी सामने आया है कि एक कथित पत्रकार से हुई चूक के कारण बिना पूरी जांच-पड़ताल के वीडियो को साझा कर दिया गया, जिसके बाद यह तेजी से सोशल मीडिया पर फैल गया। इसके चलते आमजन के बीच गलत धारणा बनी और सांसद को अनावश्यक रूप से आलोचना का 2सामना करना पड़ा।
जानकारों के अनुसार, सांसद मुकेश राजपूत का परिवार लंबे समय से सामाजिक और शैक्षिक रूप से सक्रिय रहा है। उनके तीन पुत्र, भतीजे तथा परिवार की बहुएं भी सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं। ऐसे में परिवार की कुल आर्थिक प्रगति को केवल किसी एक व्यक्ति से जोड़कर देखना तथ्यों के साथ अन्याय है।
बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर सांसद को यह कहकर निशाना बनाया जा रहा है कि वे दस वर्षों में अरबपति बन गए, जबकि इस दावे के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज या आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है। तथ्य यह है कि वायरल वीडियो नाम की समानता और अधूरी जानकारी पर आधारित है।
सत्यापन के बिना साझा न करें सामग्री
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सोशल मीडिया पर किसी भी पोस्ट या वीडियो को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई की जांच कितनी जरूरी है। बिना सत्यापन किसी व्यक्ति के चरित्र और ईमानदारी पर सवाल उठाना न केवल गलत है, बल्कि यह समाज और लोकतंत्र—दोनों के लिए नुकसानदेह है।
फिलहाल, स्थानीय स्तर पर लोग वायरल वीडियो की सच्चाई समझने लगे हैं और अपील की जा रही है कि गलत जानकारी फैलाने से पहले तथ्यों की पुष्टि अवश्य की जाए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति की छवि को नुकसान न पहुंचे।

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