डॉ विजय गर्ग
देश में उत्तर प्रदेश के बाद राजस्थान में भी स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए समाचार पत्र का पाठन अनिवार्य किया गया है। यह पहल निस्संदेह सराहनीय है और अन्य राज्यों को भी इसे अपनाना चाहिए। मगर केवल अक्षर ज्ञान से बच्चे अखबार में प्रकाशित सामग्री को नहीं समझ पाते; समाचार और विचार का जीवन में अर्थ समझने के लिए मीडिया साक्षरता आवश्यक है। आज दुनिया के कई हिस्सों में मीडिया साक्षरता को गणित की तरह गंभीर विषय के रूप में पढ़ाने पर बल दिया जा रहा है, जबकि भारत का शैक्षिक चिंतन अभी इससे काफी दूर है। अखबार पठन की इस अच्छी शुरुआत के साथ अगर स्कूलों में मीडिया साक्षरता भी जरूरी की जाए, तभी यह पहल अपने उद्देश्य को सार्थक कर पाएगी।
पढ़ना-लिखना जानने वाला
व्यक्ति वर्षों से ‘साक्षर’ माना जाता रहा है, लेकिन 21वीं सदी में यह मानदंड बदल चुका है। आज विश्व में व्यापक सहमति है कि वास्तविक साक्षर वही है, जो ‘मीडिया साक्षर’ हो। इसका प्रशिक्षण ग्रहण किए बिना कोई व्यक्ति मीडिया का सही से प्रयोग नहीं कर पाता, फिर समाज के यथार्थ को समझने की तो बात ही दूर है। सूचना सचेत लोगों के बिना एक सचेत समाज का निर्माण संभव नहीं है। देश को यह यथार्थ तत्काल याद
दिलाने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि पहली बार उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने स्कूलों में समाचार पत्र पढ़ना अनिवार्य किया है। इससे पहले हिमाचल प्रदेश ने इसी तरह का कदम उठाया था।
वास्तविक लाभ
इस पहल की सराहना के साथ यह स्मरण करना भी जरूरी है कि भारत में मीडिया साक्षरता के अभाव में बच्चे समाचार पत्र को सही तरीके से पढ़ नहीं पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें, तो वे इसका वास्तविक लाभ नहीं ले पाएंगे। पाठ्यक्रमों में जितना महत्त्व गणित पढ़ाने को दिया जाता है, उतना ही महत्त्व मीडिया साक्षरता को देने पर ही सूचना सचेत समाज का सही अर्थों में निर्माण हो पाएगा। विकसित देशों में तो शिक्षकों से ज्यादा पुस्तकालय लोगों को मीडिया एवं सूचना
साक्षर बनाने में योगदान देते हैं। अमरेकिन प्रेजिडेंशियल पुस्तकालय ने तो विद्यार्थियों की सुविधा के लिए पूरा ढांचा तैयार करके दिया है कि समाचार को व्यवस्थित तरीके से कैसे पढ़ें और उसके लाभ-हानियों को कैसे समझें। विकासशील देशों, यहां तक कि भूटान जैसे छोटे राष्ट्र में भी मीडिया साक्षरता के महत्त्व को स्वीकारा जा रहा है।
परंपरा के अनुरूप
स्कूलों में समाचार पत्र के पाठन को अनिवार्य करने की पहल से उम्मीद जगी है कि मीडिया साक्षरता की दिशा में भी समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। चूंकि इस क्षेत्र में भारत पहले ही काफी पीछे है, इसलिए वैश्विक पाठ्यक्रमों को ज्यों का त्यों अपनाना संभव नहीं। हमें देश के सामाजिक अनुभव और बौद्धिक परंपरा के अनुरूप अपना पाठ्यक्रम विकसित करना होगा। साथ ही यह स्मरण रखना जरूरी है कि
यह वही भारत है, जिसके पास सूचना और मीडिया साक्षरता की शिक्षण परंपरा हजारों
वर्ष पुरानी है। वेदों के प्रादुर्भाव के तुरंत बाद ही मीमांसा और न्याय जैसे ग्रंथों के माध्यम से सूचना के विश्लेषण एवं तर्क की सशक्त विधियां विकसित की गई। मीडिया और सूचना साक्षरता सिखाने के लिए भारत के पास ज्ञान की अतुल संपदा पहले से उपलब्ध है।
आधुनिक युग में तो इस विषय की शुरुआत कनाडा के ओंटारियो प्रांत ने वर्ष 1978 में की थी। शुरुआत के पीछे एक रोचक घटना है। कनाडा सरकार को लगा कि उसके युवा अमेरिका की संस्कृति के प्रभाव में रहते हैं। खोज करने पर पता चला कि यह अमेरिकी मीडिया के प्रभाव के कारण हो रहा है। विशेषज्ञों ने बताया कि वहां के लोग मीडिया साक्षर नहीं है, इसलिए ऐसा हुआ। इसके बाद शिक्षकों ने मिलकर इस विषय के लिए मजबूत पाठ्यक्रम बनाया और उसके परिणाम भी सकारात्मक रहे । युवा समझ पाए कि कैसे संदेशों को निष्क्रिय रूप से लेकर हम उनके साथ बिना सोचे बहे चले जाते हैं। उधर, यूनेस्को ने इस पर व्यापक कार्य शुरू कर दिया और पुस्तकालय विज्ञान के पहले से चल रहे सूचना साक्षरता को मीडिया साक्षरता के साथ जोड़कर सूचना सचेत समाज बनाने का खाका व्यापक कर दिया।
लोकतंत्र और समाचार माध्यम
मीडिया साक्षरता की जटिल तकनीकी अवधारणाओं में जाने से पहले कुछ मौलिक प्रश्नों को समझना अधिक आवश्यक है, क्योंकि यही मीडिया साक्षर बनने की प्रारंभिक सीढ़ियां हैं। यदि बच्चे या वयस्क को यह व्यवस्थित रूप से न बताया जाए कि एक नागरिक के लिए समाचार को सही ढंग से समझना क्यों जरूरी है, नागरिक के समाचार-बोध और लोकतंत्र के बीच क्या संबंध है, समाचार की वास्तविक संरचना क्या होती है, तो उससे सजग मीडिया प्रयोग करने की उम्मीद करना व्यर्थ है। डिजिटल माध्यमों के अनियंत्रित और अनजान स्रोतों ने तो अनेक पढ़े-लिखे लोगों को भी यह भुला दिया है कि असली समाचार कैसा होता है। इसके शिक्षण में बताया जाता है कि मीडिया काम कैसे करता है? संदेशों का निर्माण कैसे करता है? यह किस तरह संचालित होता है? समाचार व अन्य संदेशों का महत्त्व बताने के साथ उनकी सीमाएं भी बताई जाती है? फिर मीडिया संदेशों का विश्लेषण करने और उसमें पक्षपात छांटने की विधि बताई जाती है। डिजिटल तकनीक के विस्तार और उससे भ्रामक सूचनाओं दुनिया को डिजिटल साक्षरता को एक अलग शाखा बनाने पर मजबूर कर दिया। इन दिनों जब कृत्रिम मेधा का बोलबाला है, तो अब इस विषय में साक्षरता के लिए सहमति बनी है। ऐसा लगता है कि अब तो सारा ध्यान कृत्रिम मेधा साक्षरता पर ही न चला जाए। मगर इसका मूल आधार मीडिया साक्षरता से ही आएगा यानी यही विषय अब कृत्रिम मेधा के छिपे अर्थ समझने में मदद करेगा। प्रारंभिक स्तर पर सभी विषयों के शिक्षक बच्चों में समाचार के माध्यम से नागरिक बोध विकसित कर सकते हैं। इसके बाद मीडिया साक्षरता के विशेषज्ञों से पाठ्यक्रम तैयार कराकर स्कूलों में प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
(सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब)

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