उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह फैसला केवल दरों में कटौती नहीं, बल्कि नीतिगत संवेदनशीलता और प्रशासनिक सुधार का संकेत है। उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) द्वारा नए बिजली कनेक्शन पर मीटर की दरें तय करना और सुरक्षा जमा (सिक्योरिटी डिपॉजिट) की वसूली समाप्त करना—दोनों ही कदम उस लंबे समय से चली आ रही उपभोक्ता-पीड़ा का समाधान प्रस्तुत करते हैं, जो महंगे कनेक्शन और जटिल प्रक्रियाओं के कारण पैदा हुई थी।
अब तक नए कनेक्शन के लिए मीटर पर लगभग ₹6016 तक का खर्च आम आदमी के लिए एक बड़ा अवरोध था। नई व्यवस्था में 1 किलोवाट कनेक्शन के लिए ₹2800, 2 किलोवाट के लिए ₹3198 और थ्री-फेज मीटर के लिए ₹4100 की दरें तय होना, सीधे-सीधे लागत में यथार्थपरक कमी को दर्शाता है। यह बदलाव घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ छोटे दुकानदारों और स्वरोज़गार से जुड़े लोगों को भी राहत देगा—यानी बिजली अब विकास की बाधा नहीं, सहायक बनेगी।
सिक्योरिटी डिपॉजिट की वसूली बंद करने का निर्णय उपभोक्ताओं और विभाग के बीच विश्वास की नई नींव रखता है। पहले यह राशि नए कनेक्शन की राह में एक अतिरिक्त बोझ बनती थी। अब बकाया राशि को सीधे बिल में समायोजित करने की व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी और अनावश्यक विवादों में कमी आएगी। यह कदम बताता है कि व्यवस्था दंडात्मक नहीं, सेवाभावी बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सरल प्रक्रिया, तेज़ परिणाम
नई दरों का तत्काल प्रभाव से लागू होना और सभी डिस्कॉम/फील्ड कार्यालयों को स्पष्ट निर्देश देना, नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी को कम करता है। इससे न केवल देरी रुकेगी, बल्कि एक समान शुल्क की गारंटी भी मिलेगी—जो उपभोक्ता अधिकारों के लिहाज़ से अत्यंत आवश्यक है।
आर्थिक समावेशन की ओर कदम
मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए बिजली कनेक्शन का सस्ता होना आर्थिक समावेशन को गति देगा। घरों में रोशनी, दुकानों में व्यापार और छोटे उद्योगों में उत्पादन—इन सबका सीधा संबंध सुलभ बिजली से है। जब कनेक्शन लेना आसान होगा, तो अवैध कनेक्शन की प्रवृत्ति भी घटेगी और राजस्व में दीर्घकालिक स्थिरता आएगी।
UPPCL का यह फैसला संकेत देता है कि उपभोक्ता-केंद्रित सुधार संभव हैं—बस इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीति चाहिए। मीटर दरों में कटौती, सिक्योरिटी डिपॉजिट का अंत और बिल-आधारित समायोजन—ये सभी मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाते हैं, जहां बिजली सेवा सस्ती, सरल और पारदर्शी हो। अब ज़रूरत है निरंतर निगरानी की, ताकि घोषित लाभ ज़मीनी हकीकत में भी उतने ही प्रभावी दिखें।






