यूथ इंडिया
विस्तृत ऐतिहासिक उल्लेख
19वीं सदी के अंत में जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और पश्चिमी दुनिया उसे एक पिछड़े देश के रूप में देखती थी, उसी दौर में एक युवा संन्यासी ने अमेरिका की धरती पर खड़े होकर भारत की आत्मा, दर्शन और आध्यात्मिक शक्ति का ऐसा परिचय दिया कि पूरा विश्व स्तब्ध रह गया। यह ऐतिहासिक क्षण था 11 सितंबर 1893, जब स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म संसद में अपना अमर भाषण दिया।
शिकागो का वह ऐतिहासिक मंच
अमेरिका के शिकागो में आयोजित यह सम्मेलन दुनिया भर के धर्मगुरुओं, दार्शनिकों और विचारकों का अभूतपूर्व संगम था। इसका उद्देश्य था—विश्व के विभिन्न धर्मों के बीच संवाद और सहअस्तित्व की भावना को मजबूत करना। भारत की ओर से किसी आधिकारिक प्रतिनिधि को भेजे जाने की व्यवस्था नहीं थी, लेकिन स्वामी विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के विचारों को लेकर स्वयं इस मंच तक पहुँचे।
“Sisters and Brothers of America” — एक वाक्य, एक इतिहास जैसे ही स्वामी विवेकानंद मंच पर पहुँचे और अपने भाषण की शुरुआत इन शब्दों से की “Sisters and Brothers of America”, पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह कोई साधारण संबोधन नहीं था। यह शब्द समानता, अपनत्व और वैश्विक भाईचारे का उद्घोष था। करीब दो मिनट तक श्रोता तालियाँ बजाते रहे—यह उस सम्मेलन का अभूतपूर्व दृश्य था।
भाषण का सार और विचार
स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में भारत की उस सनातन परंपरा को दुनिया के सामने रखा, जो सहिष्णुता, सर्वधर्म समभाव और मानवता पर आधारित है। उन्होंने कहा “मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से संबंध रखता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता सिखाई।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का धर्म किसी एक मत या पंथ तक सीमित नहीं, बल्कि सत्य की खोज का मार्ग है। उन्होंने धार्मिक कट्टरता, संकीर्णता और हिंसा की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इन प्रवृत्तियों ने ही मानवता का सबसे अधिक नुकसान किया है।
भारत की छवि बदली, विश्व की सोच बदली
उस भाषण के बाद पश्चिमी दुनिया में भारत को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल गया। भारत अब केवल रहस्यमयी देश नहीं, बल्कि आध्यात्मिक गुरु के रूप में देखा जाने लगा। अमेरिकी अखबारों में स्वामी विवेकानंद को
“The Cyclonic Monk from India” कहा गया।
उनके विचारों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की ताकत उसकी तलवार में नहीं, बल्कि उसके विचार और दर्शन में है।
स्वामी विवेकानंद का यह भाषण केवल धर्मसभा तक सीमित नहीं था। यह युवाओं के लिए आत्मविश्वास का मंत्र था। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि, आत्मगौरव के बिना कोई राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता, अपनी संस्कृति पर गर्व करना संकीर्णता नहीं, आत्मसम्मान है मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है|
आज भी उतना ही प्रासंगिक
आज, जब दुनिया धार्मिक टकराव, असहिष्णुता और पहचान के संकट से जूझ रही है, स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। यह भाषण हमें सिखाता है कि संवाद, सम्मान और सह-अस्तित्व ही विश्व शांति का मार्ग है।
शिकागो का वह भाषण केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, वह भारत की आत्मा का विश्व के सामने उद्घोष था।
स्वामी विवेकानंद ने उस दिन साबित कर दिया कि एक विचारवान युवा, बिना सत्ता और सेना के भी, दुनिया की दिशा बदल सकता है।
वह भाषण आज भी गूंज रहा है—हर उस युवा के भीतर, जो भारत को फिर से विश्वगुरु के रूप में देखना चाहता है।






