नई दिल्ली: विश्व हिंदी सम्मेलन (World Hindi Conference) का अंतरराष्ट्रीय मंच इस बार फर्रुखाबाद (Farrukhabad) के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं मूर्धन्य साहित्यकार जवाहर सिंह गंगवार के व्यक्तित्व, कृतित्व और ओजस्वी वाणी का साक्षी बना। सम्मेलन के मंच से उनकी रचना का पाठ केवल साहित्यिक प्रस्तुति नहीं था, बल्कि हिंदी, न्याय, समाज और राष्ट्रबोध का एक सशक्त उद्घोष था, जिसने देश-विदेश से आए विद्वानों को भावविभोर कर दिया।
जवाहर सिंह गंगवार की वाणी में अनुभव की गंभीरता थी, शब्दों में विधि की दृढ़ता और भावों में हिंदी के प्रति अगाध प्रेम। जैसे ही उन्होंने मंच से अपनी रचना का पाठ आरंभ किया, सभागार पूरी तरह शांत हो गया और समापन पर तालियों की गड़गड़ाहट ने यह सिद्ध कर दिया कि उनकी प्रस्तुति सम्मेलन की सबसे प्रभावशाली प्रस्तुतियों में शुमार रही।
सम्मेलन स्थल पर जवाहर सिंह गंगवार का हिंदी साहित्य में विशिष्ट योगदान और विधि जगत में उनकी प्रतिष्ठा को देखते हुए साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और प्रतिनिधियों ने उनका जोरदार इस्तकबाल किया। अनेक देशों से आए हिंदी विद्वानों ने उनसे संवाद कर उनके विचारों को प्रेरणादायी बताया और कहा कि ऐसे रचनाकार हिंदी को वैश्विक ऊँचाइयों तक ले जाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

इस विश्व हिंदी सम्मेलन में विश्व के लगभग 60 देशों के हिंदी साहित्यकार और विचारक उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाए जाने की पुरजोर मांग की। जवाहर सिंह गंगवार की रचना और उनके विचार इस अभियान के लिए वैचारिक ऊर्जा बने और हिंदी के वैश्विक अभियान को नई दिशा मिली।
गरिमामयी उपस्थिति ने बढ़ाई शोभा
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मॉरीशस के शिक्षा एवं मानव संसाधन मंत्री महेंद्र गंगा प्रसाद की उपस्थिति ने आयोजन को अंतरराष्ट्रीय गरिमा प्रदान की। उन्होंने हिंदी को विश्व एकता, संस्कृति और संवाद की भाषा बताते हुए ऐसे सम्मेलनों को समय की आवश्यकता बताया।
फर्रुखाबाद के लिए स्वर्णिम गौरव
विश्व हिंदी सम्मेलन के मंच पर जवाहर सिंह गंगवार की सशक्त उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि फर्रुखाबाद की धरती केवल ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि साहित्यिक और बौद्धिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। उनका यह गौरवपूर्ण क्षण न केवल जनपद, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के लिए सम्मान और प्रेरणा का विषय बना।
जवाहर सिंह गंगवार आज केवल एक अधिवक्ता या साहित्यकार नहीं, बल्कि हिंदी की वैश्विक चेतना के प्रखर प्रहरी के रूप में उभरकर सामने आए हैं। उनकी यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश है कि संकल्प, साधना और भाषा-प्रेम से विश्व मंच पर भी अपनी पहचान बनाई जा सकती है।


