व्यापरिक मठाधीशों ने लील ली जन सामान्य की सुविधा
सप्ताह में एक दिन की परेशानी का हवाला दे बंद कराया संडे बाजार

उपकार मणि” उपकार”
फर्रुखाबाद।
शहर के हृदय स्थल चौक से नेहरू रोड तक वर्षों से लगने वाला संडे बाजार आखिरकार राजनीति और तथाकथित व्यवस्था की भेंट चढ़ गया। रविवार को लगने वाला यह बाजार केवल खरीद-फरोख्त का केंद्र नहीं था, बल्कि गरीब, मेहनतकश और सीमित आय वाले लोगों की आजीविका का मजबूत सहारा भी था। संडे बाजार के बंद होने से न सिर्फ सैकड़ों छोटे दुकानदारों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है, बल्कि आमजन को भी सस्ती और जरूरत की वस्तुएं मिलना मुश्किल हो गया है।
कभी रविवार के दिन चौक से नेहरू रोड तक मेला जैसा माहौल रहता था। फुटपाथ पर सजी दुकानों में गर्म कपड़े, जूते-चप्पल, रोजमर्रा का घरेलू सामान और बच्चों के कपड़े बेहद सस्ती दरों पर मिल जाते थे। खासकर सर्दियों के मौसम में यह बाजार गरीब और मध्यम वर्ग के लिए किसी वरदान से कम नहीं था। सीमित आय वाले परिवार यहां से अपनी जरूरतें पूरी कर लेते थे। लेकिन अब यह बाजार बंद होने से उनके सामने महंगाई की मार और गहरी हो गई है।
समाजसेवी डॉ. संदीप शर्मा ने संडे बाजार के बंद होने को सीधे तौर पर गरीबों के पेट पर लात बताया है। उन्होंने कहा कि यह बाजार छोटे व्यापारियों और सामान्य से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए जीवन रेखा था। डॉ. शर्मा का कहना है कि सर्दी के मौसम में यहां से गरीब परिवारों को सस्ते गर्म कपड़े मिल जाते थे, जिससे वे ठंड से कुछ राहत पा लेते थे। लेकिन तथाकथित व्यापारी मठाधीशों और कुछ प्रभावशाली लोगों को यह बात कैसे मंजूर हो सकती थी कि कोई सामान्य स्थिति का व्यक्ति भी सम्मानपूर्वक सर्दी काट ले।
उन्होंने आरोप लगाया कि संडे बाजार के बंद होने से बड़े व्यापारी और राजनीतिक संरक्षण पाने वाले लोग खुश होंगे, क्योंकि सस्ता बाजार खत्म होने से अब महंगे दामों पर सामान बेचने का रास्ता साफ हो गया है। वहीं, फुटपाथ पर मेहनत कर अपना और अपने परिवार का पेट पालने वाले छोटे दुकानदार बेरोजगारी के कगार पर खड़े हो गए हैं।
शहरवासियों का भी कहना है कि जब बड़े-बड़े महानगरों में संडे बाजार, बुध बाजार और साप्ताहिक हाट सफलतापूर्वक चल रहे हैं, तो फर्रुखाबाद में इसे बंद करना समझ से परे है। अक्सर प्रशासन और जनप्रतिनिधि फर्रुखाबाद को बड़े शहरों की तर्ज पर विकसित करने की बात करते हैं, लेकिन जब ऐसा कोई जनोपयोगी और गरीब हितैषी कदम वर्षों से चला आ रहा था, तो उसी से पीछे हटना विरोधाभास को दर्शाता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि प्रशासन को यातायात या अव्यवस्था की समस्या थी, तो उसका समाधान निकाला जा सकता था। बाजार को व्यवस्थित तरीके से लगाने, समय और स्थान तय करने जैसे विकल्प मौजूद थे। लेकिन सीधे बाजार को ही बंद कर देना गरीबों और छोटे व्यापारियों के साथ अन्याय है।
कुल मिलाकर, चौक का संडे बाजार बंद होना सिर्फ एक बाजार का बंद होना नहीं है, बल्कि यह शहर की उस संवेदनशीलता पर सवाल है, जो गरीब, मजदूर और छोटे व्यापारियों के प्रति होनी चाहिए। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि राजनीति और दबाव से ऊपर उठकर इस फैसले पर पुनर्विचार करें, ताकि एक बार फिर संडे बाजार की रौनक लौट सके और गरीबों की सूनी थालियों में उम्मीद की रोटी वापस आ सके।

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