समय-समय पर समाज के भीतर से उठने वाली आवाज़ें यह संकेत देती हैं कि देश केवल शासन-प्रशासन से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी से आगे बढ़ता है। अलीगढ़ में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रवीण तोगड़िया का वक्तव्य इसी सामाजिक विमर्श का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने हिंदू समाज को जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर एकजुट होने का आह्वान किया।
उनका कहना है कि हिंदू समाज आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां आंतरिक विभाजन सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। जाति, वर्ग और क्षेत्रीय पहचान ने उस एकता को कमजोर किया है, जो किसी भी समाज की मूल शक्ति होती है। ऐसे में उनका यह सुझाव कि हर गांव और हर कॉलोनी में हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ हो, केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बनकर सामने आता है।
हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ यहां किसी एक संप्रदाय या वर्ग की बात नहीं करता, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक सूत्र की ओर इशारा करता है। सामूहिक प्रार्थनाएं और आयोजन सदियों से समाज को जोड़ने का माध्यम रहे हैं। जब लोग एक साथ बैठते हैं, संवाद करते हैं और एक उद्देश्य से जुड़ते हैं, तो आपसी दूरी अपने आप कम होने लगती है।
जनसंख्या और भविष्य की चिंता
प्रवीण तोगड़िया ने अपने वक्तव्य में जनसंख्या संतुलन को लेकर जो चिंता जताई, वह केवल आंकड़ों की बहस नहीं है, बल्कि भविष्य की सामाजिक संरचना से जुड़ा प्रश्न है। उनका यह तर्क कि आने वाले दशकों में जनसांख्यिकीय असंतुलन सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव डाल सकता है, एक व्यापक विमर्श की मांग करता है।
इसी क्रम में जनसंख्या नियंत्रण कानून और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों का उल्लेख यह दर्शाता है कि वे सामाजिक एकरूपता और समान नियमों को दीर्घकालीन समाधान के रूप में देखते हैं।
अवैध घुसपैठ और राष्ट्रीय चिंता
देश में अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों का मुद्दा केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि संसाधनों, रोजगार और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा है। इस विषय पर सख्ती की मांग दरअसल उस चिंता को उजागर करती है, जो आम नागरिकों के मन में लंबे समय से बनी हुई है।
तीन बच्चों का आह्वान और “सप्त संकल्प” की बात, एक संगठित सामाजिक रणनीति की ओर संकेत करती है। हालांकि इस पर मतभेद संभव हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि संदेश समाज को निष्क्रिय दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार बनाने का है—तन, मन और धन से।
यह संपादकीय किसी एक व्यक्ति या संगठन के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि उस विचारधारा के विश्लेषण का प्रयास है, जो समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भावनाओं के साथ-साथ विवेक, संवाद और संवैधानिक मूल्यों के संतुलन से आगे बढ़ा जाए। यदि एकता का संदेश नफरत नहीं, बल्कि समरसता से जुड़ा हो, तो वह समाज को मजबूत करता है।
हिंदू समाज हो या कोई भी सामाजिक समूह—
एकजुटता तभी सार्थक है, जब वह सबको साथ लेकर चले।






