शरद कटियार
आज उत्तर प्रदेश को लेकर जो तस्वीर मंचों, समारोहों और सरकारी वक्तव्यों में दिखाई जाती है, वह चमकदार है, आत्मविश्वास से भरी हुई है और “बदलते भारत” के दावे से सजी हुई है। बड़े-बड़े मंचों से कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बन चुका है, यहां पॉलिसी पैरालिसिस खत्म हो चुका है, निवेशकों की लाइन लगी है, स्टार्टअप्स की बाढ़ आ गई है और भारत अब कमजोर नहीं रहा।
लेकिन संपादकीय का काम केवल तालियां बजाना नहीं होता, बल्कि प्रश्न पूछना, परतें खोलना और हकीकत को आईना दिखाना भी होता है।
यही वह बिंदु है, जहां सवाल उठता है—
क्या घोषणाओं का यह उत्तर प्रदेश वही उत्तर प्रदेश है, जिसमें आम आदमी जी रहा है?
क्या निवेश और जीडीपी के आंकड़े उस मां की थाली भर पा रहे हैं, जो आज भी अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी नहीं दे पा रही?
घोषणाओं की ऊंचाई, ज़मीनी हकीकत की गहराई
यह सच है कि उत्तर प्रदेश में इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम हुआ है। सड़कें बनी हैं, एक्सप्रेस-वे बने हैं, रेलवे नेटवर्क का विस्तार हुआ है और रैपिड रेल जैसी परियोजनाओं का शोर भी है। यह भी सच है कि निवेश सम्मेलन हुए, ग्राउंड ब्रेकिंग के आंकड़े जारी हुए और फाइलों में हजारों करोड़ के प्रस्ताव दर्ज हैं।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि कितनी घोषणाएं हुईं, सवाल यह है कि
उन घोषणाओं का असर किसके जीवन में दिखा?
आज भी उत्तर प्रदेश के गांवों में, कस्बों में, झुग्गियों में और शहरों की मलिन बस्तियों में ऐसे लाखों परिवार हैं—
जिनकी थाली आधी भरी रहती है
जिनके बच्चों की पढ़ाई गरीबी के कारण छूट जाती है
जिनके लिए “स्टार्टअप” शब्द उतना ही दूर है, जितना आसमान
अगर प्रदेश की जीडीपी बढ़ रही है, तो फिर सवाल उठता है कि
गरीब की थाली क्यों नहीं भर रही?
स्टार्टअप बनाम स्ट्रीट लाइफ
बार-बार कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में 18 हजार से अधिक स्टार्टअप हैं। यह आंकड़ा सुनने में आकर्षक लगता है, लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए—
इन स्टार्टअप्स का लाभ किसे मिला?
प्रदेश का युवा आज भी—
प्रतियोगी परीक्षाओं की लाइन में खड़ा है,
बेरोजगारी से जूझ रहा है,
ठेके, संविदा और अस्थायी नौकरियों में जीवन गुजार रहा है,
स्टार्टअप की चमक अक्सर शहरी और चुनिंदा वर्ग तक सीमित रह जाती है। गांव का युवा आज भी रोज़गार के लिए महानगरों की ओर पलायन कर रहा है।
यदि स्टार्टअप ही विकास का पैमाना है, तो गांव क्यों खाली हो रहे हैं?
निवेश का दावा और भूख का सच
सरकारी मंचों से कहा जाता है कि अब कोई निवेशक नीति-गत जड़ता का शिकार नहीं होता। हिंदूजा जैसे बड़े उद्योग समूहों के नाम गिनाए जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश निवेशकों का भरोसेमंद ठिकाना बन चुका है।
लेकिन संपादकीय पूछता है—
क्या निवेश का भरोसा आम नागरिक की जिंदगी में भरोसा बन पाया?
आज भी दिहाड़ी मजदूर की मजदूरी अस्थिर है,किसान लागत और कर्ज के दबाव में है,महंगाई ने गरीब और मध्यम वर्ग की कमर तोड़ रखी है…
अगर निवेश आया है, तो उसका वितरण इतना असमान क्यों है?
क्यों विकास का फल कुछ इलाकों और कुछ वर्गों तक ही सिमट गया है?
यह भी कहा जाता है कि भारत अब अपने हथियार खुद बना रहा है, सेना का सारा सामान देश में ही बनेगा, और भारत कमजोर नहीं रहा। यह बात राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वाभिमान के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
लेकिन आत्मनिर्भरता का मतलब केवल हथियार बनाना नहीं होता।
आत्मनिर्भरता तब होती है, जब नागरिक अपने जीवन की बुनियादी जरूरतें खुद पूरी कर सके।
आज भी उत्तर प्रदेश में—
लाखों लोग सरकारी राशन पर निर्भर हैं,मुफ्त अनाज योजना उनके लिए जीवन रेखा बनी हुई है
यह सवाल असहज है, लेकिन जरूरी है—अगर प्रदेश इतना आत्मनिर्भर हो चुका है, तो मुफ्त राशन की जरूरत क्यों पड़ रही है?
सरकारें आंकड़ों से बात करना पसंद करती हैं15 लाख करोड़ की ग्राउंड ब्रेकिंग,,9.5 प्रतिशत जीडीपी योगदान,हजारों किलोमीटर सड़कें।
लेकिन इंसान आंकड़ा नहीं होता।
एक भूखा पेट, एक बेरोजगार हाथ, एक कर्ज में डूबा किसान—
ये सब किसी एक्सेल शीट में फिट नहीं बैठते।
आज भी उत्तर प्रदेश में—
कुपोषण एक बड़ी समस्या है
मातृ मृत्यु और शिशु मृत्यु दर चिंता का विषय है,सरकारी अस्पतालों में अव्यवस्थाएं आम हैं,अगर विकास इतना व्यापक है, तो ये समस्याएं अब तक क्यों बनी हुई हैं?
घोषणा बनाम समाधान
राजनीति में घोषणा करना आसान है, समाधान देना कठिन।
घोषणाएं मंचों पर ताली बटोरती हैं,
समाधान ज़मीन पर पसीना मांगते हैं।
उत्तर प्रदेश की बड़ी चुनौती आज भी
गरीबी,बेरोजगारी,शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता,
सामाजिक असमानता,
इन पर काम धीमा, बिखरा और अक्सर प्रचार से ढका हुआ दिखता है।सवाल जो पूछे जाने जरूरी हैं
यह संपादकीय किसी उपलब्धि को नकारता नहीं, लेकिन आंख मूंदकर स्वीकार भी नहीं करता।
यह सवाल पूछता है,क्या विकास का मतलब केवल इंफ्रास्ट्रक्चर है?क्या जीडीपी बढ़ने से गरीब अपने आप अमीर हो जाता है?
क्या निवेश सम्मेलन से भूख खत्म हो जाती है?क्या घोषणाओं की रफ्तार ज़मीनी बदलाव से तेज़ नहीं हो गई है?
उत्तर प्रदेश बदलाव के दौर में है—इससे इनकार नहीं।
लेकिन यह बदलाव अधूरा, असमान और कई जगह सतही भी है।
जब तक हर घर में दो वक्त की रोटी सुनिश्चित नहीं होती,हर युवा को सम्मानजनक रोजगार नहीं मिलता,हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलती,तब तक बड़े-बड़े दावे केवल घोषणाओं की राजनीति ही कहलाएंगे।सच्चा विकास वह होता है,जो मंच से उतरकर आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे।आज जरूरत है— तालियों की नहीं,आत्ममंथन की।

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