लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट (High Court) की लखनऊ पीठ (Lucknow Peeth) ने अग्निशमन यंत्रों की व्यवस्था को लेकर गंभीर लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने झांसी, हमीरपुर, हापुड़, शामली, फिरोजाबाद, कुशीनगर और सिद्धार्थनगर के जनपद न्यायाधीशों पर नाराजगी जताते हुए स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि तय समयसीमा में जवाब नहीं दिया गया तो सख्त आदेश पारित किए जाएंगे।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन सात जिलों में न्यायालय परिसरों में अग्निशमन यंत्र लगाए जाने से संबंधित प्रस्ताव मांगे गए थे, लेकिन बार-बार पत्राचार के बावजूद किसी भी जनपद न्यायाधीश की ओर से कोई उत्तर नहीं दिया गया। कोर्ट ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही करार दिया है। न्यायालय ने फिलहाल हाईकोर्ट प्रशासन के अधिवक्ता के अनुरोध पर कठोर आदेश पारित करने से परहेज किया है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि अगले दो सप्ताह में जवाब दाखिल नहीं किया गया तो कोर्ट को सख्त रुख अपनाना पड़ेगा।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने वर्ष 2011 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। मामले की अगली सुनवाई के लिए 27 जनवरी की तिथि तय की गई। कोर्ट ने उम्मीद जताई है कि अगली सुनवाई से पहले सभी संबंधित जिलों के जनपद न्यायाधीश आवश्यक प्रस्ताव भेज देंगे, जिससे न्यायालय परिसरों में अग्नि सुरक्षा इंतजामों को मजबूत किया जा सके।
एक अन्य मामले में सिविल जज के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश
इसी बीच, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिद्धार्थनगर के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश मुख्य न्यायाधीश से की है। महिला और उसके नाबालिग बच्चों को जल्दबाजी में बेदखल करने के आदेश को कोर्ट ने गंभीर चूक माना है। कोर्ट ने इस मामले में राजस्व और पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी की और महिला को 48 घंटे के भीतर पुनः कब्जा दिलाने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने कहा कि एकतरफा कार्रवाई और अधिकारों के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, विशेषकर जब मामला एक महिला और नाबालिग बच्चों के आश्रय से जुड़ा हो। हाईकोर्ट के इन सख्त रुखों से साफ है कि न्यायालय अब सुरक्षा और मानवीय अधिकारों से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।


