शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद जारी हुई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश में एक साथ 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए, जो कुल मतदाताओं का लगभग 18.7 प्रतिशत है। पहले जहां उत्तर प्रदेश में 15.44 करोड़ पंजीकृत मतदाता दर्ज थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 12.55 करोड़ रह गई है। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का हटना स्वाभाविक नहीं माना जा सकता और यह प्रशासनिक प्रक्रिया में बड़ी चूक की ओर इशारा करता है।
और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनावों के लिए दिसंबर माह में ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की थी। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य के चुनावों के लिए तैयार की गई इस सूची के अनुसार पंचायत मतदाताओं की कुल संख्या 12.69 करोड़ बताई गई है। यह सूची भी हाल ही में, उसी समयावधि में तैयार की गई थी।
जब पंचायत चुनावों के लिए तैयार मतदाता सूची में 12.69 करोड़ मतदाता हैं, तो फिर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा जारी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की संयुक्त SIR सूची में मतदाताओं की संख्या 12.55 करोड़ कैसे हो सकती है। दोनों सूचियों के आंकड़ों में 14 लाख से अधिक मतदाताओं का अंतर स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में गंभीर असंगतियां हैं।
यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं है, बल्कि यह सीधे नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा मामला है। एक ही प्रदेश में एक ही समय पर दो संवैधानिक संस्थाओं द्वारा तैयार की गई सूचियों में इतना बड़ा अंतर यह साबित करता है कि कहीं न कहीं बड़े स्तर पर लापरवाही या अव्यवस्था हुई है। पंचायत चुनावों में जिन नागरिकों को मतदाता माना जा रहा है, वही नागरिक विधानसभा और लोकसभा चुनावों की सूची से बाहर कर दिए गए हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि 2.89 करोड़ मतदाताओं का अचानक सूची से बाहर हो जाना किसी भी सामान्य जनसंख्या परिवर्तन से मेल नहीं खाता। न तो इतनी बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं, न ही इतने लोगों का सामूहिक पलायन दर्ज है। ऐसे में यह कटौती लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सीधा सवाल खड़ा करती है।
मताधिकार लोकतंत्र की आत्मा है। यदि करोड़ों नागरिकों के नाम बिना पारदर्शी और ठोस आधार के मतदाता सूची से हटा दिए जाएं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ गंभीर खिलवाड़ है। उत्तर प्रदेश में सामने आए ये आंकड़े साफ तौर पर यह दर्शाते हैं कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में बड़ी गड़बड़ी हुई है, जिसकी निष्पक्ष और सार्वजनिक जांच बेहद जरूरी है।





