
प्रशांत कटियार
आज का भारत एक ओर दुनिया का सबसे युवा देश कहलाता है, तो दूसरी ओर यही युवा वर्ग सबसे गहरे संकट से गुजर रहा है। यह संकट है—बेरोजगारी। डिग्रियों की संख्या बढ़ रही है, कॉलेज और विश्वविद्यालय हर साल लाखों स्नातक और परास्नातक तैयार कर रहे हैं, लेकिन रोजगार के अवसर उसी अनुपात में घटते जा रहे हैं। यही विरोधाभास आज के युवा वर्ग की सबसे बड़ी पीड़ा बन चुका है।
एक समय था जब पढ़ाई को सुरक्षित भविष्य की गारंटी माना जाता था। माता-पिता बच्चों को यह सपना दिखाते थे कि पढ़-लिखकर नौकरी मिलेगी, सम्मान मिलेगा और जीवन पटरी पर आ जाएगा। लेकिन आज का युवा इस सपने और हकीकत के बीच पिस रहा है। पढ़ाई पूरी करने के बाद भी वर्षों तक नौकरी की प्रतीक्षा करना, अस्थायी कामों में उलझे रहना या बेरोजगारी का दंश झेलना—यही आज की सामान्य कहानी बन चुकी है।
सरकारी नौकरियों को आज भी सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है। यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। एक-एक परीक्षा में लाखों युवा आवेदन करते हैं, जबकि सीटें गिनती की होती हैं। यह असंतुलन युवाओं पर जबरदस्त मानसिक दबाव बनाता है।
कई युवा अपनी उम्र के सबसे कीमती साल केवल तैयारी में लगा देते हैं। कोचिंग, किताबें, फॉर्म फीस, यात्रा—इन सब पर हजारों नहीं, लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। इसके बावजूद सफलता की गारंटी नहीं होती।
इस स्थिति को और भयावह बना दिया है पेपर लीक, भर्ती में देरी और परीक्षाओं के रद्द होने ने। जब मेहनत के बाद भी परीक्षा निष्पक्ष न हो, तो युवाओं का भरोसा व्यवस्था से उठने लगता है। बार-बार बदली जाने वाली तिथियां, वर्षों तक लटकी भर्तियां और अदालती प्रक्रियाएं युवाओं के धैर्य की परीक्षा लेती हैं।
युवा यह पूछने को मजबूर है—क्या ईमानदारी से पढ़ाई करना अब भी मायने रखता है?
निजी क्षेत्र और अस्थिर रोजगार
सरकारी क्षेत्र में अवसर सीमित होने के कारण युवाओं का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र की ओर रुख करता है। लेकिन वहां भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। कम वेतन, अस्थायी अनुबंध, लंबा कार्य समय और नौकरी की असुरक्षा युवाओं को मानसिक रूप से अस्थिर कर रही है।
आज बड़ी संख्या में युवा ऐसे काम कर रहे हैं, जो उनकी योग्यता और शिक्षा के अनुरूप नहीं हैं। इससे न केवल आर्थिक असंतोष पैदा होता है, बल्कि आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर
बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह मानसिक और सामाजिक संकट भी है। लंबे समय तक नौकरी न मिलने से युवा खुद को असफल मानने लगता है। परिवार का दबाव, समाज की अपेक्षाएं और रिश्तेदारों के सवाल युवाओं को भीतर से तोड़ देते हैं।
डिप्रेशन, एंग्जायटी और आत्महत्या जैसे गंभीर मुद्दे आज युवाओं में तेजी से बढ़ रहे हैं। यह एक चेतावनी है कि बेरोजगारी को केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से समझना होगा।
जब स्थानीय स्तर पर अवसर नहीं मिलते, तो युवा पलायन को मजबूरी मान लेते हैं। कोई महानगरों की ओर जाता है, तो कोई विदेश जाने का सपना देखता है। यह पलायन केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और समाज का भी नुकसान है।
गांव और छोटे शहर अपने सबसे सक्षम युवाओं को खो रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन और गहराता जा रहा है।
नीति निर्माता अक्सर भारत की युवा आबादी को “डेमोग्राफिक डिविडेंड” बताते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह लाभ अपने आप मिल जाएगा?
यदि यही युवा बेरोजगार, निराश और असंतुष्ट रहेगा, तो यही डिविडेंड जल्द ही डेमोग्राफिक बोझ में बदल सकता है। बेरोजगारी सामाजिक असंतोष, अपराध, नशे और अराजकता को जन्म दे सकती है। यह किसी भी देश के लिए खतरनाक संकेत है।
बेरोजगारी की समस्या का समाधान केवल घोषणाओं और आंकड़ों से नहीं होगा। इसके लिए ठोस और ईमानदार प्रयास जरूरी हैं—
समयबद्ध और पारदर्शी भर्तियां
पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई और जवाबदेही,
कौशल आधारित और रोजगारोन्मुख शिक्षा,
स्थानीय स्तर पर उद्योग और रोजगार सृजन,
स्टार्टअप और स्वरोजगार के लिए वास्तविक समर्थन,
और सबसे जरूरी, युवाओं के साथ संवाद और विश्वास होना चाहिए।
युवाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि नीति निर्माण का भागीदार बनाना होगा। उनकी समस्याओं को सुना जाएगा, तभी समाधान निकलेंगे।
बेरोजगारी युवाओं की कमजोरी नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की विफलता का प्रतिबिंब है। आज का युवा मेहनती है, प्रतिभाशाली है और कुछ कर दिखाने की क्षमता रखता है। जरूरत है तो बस सही अवसर, निष्पक्ष व्यवस्था और भरोसे की।
यदि देश को सचमुच आगे बढ़ना है, तो उसे अपने युवाओं को बोझ नहीं, संपत्ति समझना होगा।
क्योंकि याद रखिए—
बेरोजगार युवा केवल अपनी जिंदगी से नहीं हारता, देश का भविष्य भी कमजोर पड़ता है।





