कानपुर सांसद रमेश अवस्थी ने रिश्तों की राजनीति से रची नई मिसाल

कानपुर/फर्रुखाबाद। बेटे के विवाह और उससे जुड़े आयोजनों के जरिए रमेश अवस्थी ने न केवल एक पारिवारिक दायित्व निभाया, बल्कि अपने गृह जनपद फर्रुखाबाद को दो दशक बाद राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया। वर्षों से राजनीतिक और राष्ट्रीय विमर्श से लगभग शून्य हो चुके फर्रुखाबाद का नाम एक बार फिर देशभर में गूंजा—और इसकी वजह बना रमेश अवस्थी का सामाजिक कद, पारिवारिक संस्कार और सर्वसमाज से जुड़ा व्यक्तित्व।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक विवाह समारोह नहीं था, बल्कि फर्रुखाबाद की खोई पहचान को लौटाने वाला अवसर भी बन गया। दिल्ली से लेकर लखनऊ और कानपुर तक, हर राजनीतिक मंच पर फर्रुखाबाद का उल्लेख हुआ—जो पिछले करीब बीस वर्षों से दुर्लभ हो गया था।
रमेश अवस्थी का सार्वजनिक जीवन किसी सियासी विरासत का परिणाम नहीं, बल्कि पत्रकारिता से राजनीति तक के संघर्षपूर्ण सफर की कहानी है। सच्चाई के साथ खड़े रहने की आदत उन्होंने पत्रकारिता से सीखी और उसी सिद्धांत को राजनीति में भी बनाए रखा।
राजनीति के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने कभी धन, वैभव या दिखावे को महत्व नहीं दिया। उनका मानना रहा है कि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन रिश्ते, भरोसा और इंसानियत स्थायी पूंजी हैं।
रमेश अवस्थी और उनके परिवार की पहचान यही रही है कि उन्होंने कभी पैसों को प्राथमिकता नहीं दी।
उनके लिए अमीर और गरीब, प्रभावशाली और सामान्य—सब समान हैं। यही वजह है कि उनके घर और कार्यक्रमों में आम आदमी उतनी ही सहजता से पहुंच पाता है, जितना कोई बड़ा नेता या अधिकारी।
करीबी लोग बताते हैं कि उनकी राजनीति का पहला धर्म इंसानियत है। कोई जरूरतमंद मदद मांगने आए, तो पहले यह नहीं पूछा जाता कि वह किस जाति, वर्ग या दल से है—पहले यह देखा जाता है कि वह इंसान है और उसे मदद की जरूरत है।
जैसे पिता, वैसे ही बेटे—यह कहावत रमेश अवस्थी के परिवार पर पूरी तरह लागू होती है।
उनके पुत्र सचिन अवस्थी और शुभम अवस्थी ने भी अपने पिता के मूल्यों को आत्मसात किया है। विवाह आयोजनों में जिस तरह सादगी, सम्मान और सामाजिक समरसता देखने को मिली, उसने यह साफ कर दिया कि आने वाली पीढ़ी भी सेवा और संबंधों की राजनीति को ही अपना मार्ग मानेगी।
इतना ही नहीं, पूरे परिवार—जिनमें उनके भाई, भतीजे और निकट संबंधी शामिल हैं—ने रमेश अवस्थी के पदचिह्नों पर चलते हुए समाज सेवा को ही अपना परम धर्म माना है। यह परिवार सत्ता को साधन मानता है, साध्य नहीं।
इन आयोजनो के जरिए रमेश अवस्थी ने यह संदेश भी दिया कि फर्रुखाबाद केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि संभावनाओं और प्रतिभा की धरती है। यदि नेतृत्व ईमानदार और सर्वसमाज को साथ लेकर चलने वाला हो, तो कोई भी जनपद राष्ट्रीय पहचान हासिल कर सकता है।
बेटे के विवाह ने रमेश अवस्थी को केवल एक जिम्मेदार पिता के रूप में नहीं, बल्कि अपने गृह जनपद को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने वाले नेता,रिश्तों को राजनीति से ऊपर रखने वाले जनप्रतिनिधि,और इंसानियत को पहला धर्म मानने वाले सार्वजनिक व्यक्तित्व
के रूप में और मजबूत किया है।
आज यह कहा जाने लगा है कि—
रमेश अवस्थी केवल कानपुर के सांसद नहीं,बल्कि फर्रुखाबाद की आवाज़ और सर्वसमाज की उम्मीद बन चुके हैं।

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