प्रभात यादव
स्वास्थ्य किसी भी समाज की बुनियाद होता है। यह वह क्षेत्र है जहाँ मुनाफ़ा नहीं, मानवीय संवेदना सबसे अधिक ज़रूरी मानी जाती है। लेकिन आज भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था, विशेषकर आम नागरिक के लिए, एक राहत की जगह संघर्ष का कारण बनती जा रही है। जिस सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली को गरीब और मध्यम वर्ग की जीवन रेखा कहा जाता है, वही व्यवस्था आज सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है।
सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। डॉक्टरों की भारी कमी, नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ का अभाव, दवाओं की अनुपलब्धता और जांच के लिए लंबी प्रतीक्षा—ये सब अब असाधारण नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की हकीकत बन चुके हैं। एक मरीज को डॉक्टर दिखाने के लिए घंटों लाइन में लगना पड़ता है और कई बार जरूरी जांच या दवा बाहर से खरीदने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में मुफ्त इलाज का दावा कागज़ों तक सिमट कर रह जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में हालात और भी चिंताजनक हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। कहीं डॉक्टर नहीं हैं, तो कहीं मशीनें खराब पड़ी हैं। एम्बुलेंस की कमी और रेफरल सिस्टम की अव्यवस्था के कारण मरीजों को जिला या निजी अस्पतालों की ओर भेज दिया जाता है। गरीब ग्रामीण परिवारों के लिए यह यात्रा न केवल शारीरिक, बल्कि आर्थिक बोझ भी बन जाती है।
जब सरकारी व्यवस्था जवाब दे जाती है, तब आम नागरिक निजी अस्पतालों की ओर रुख करने को मजबूर होता है। लेकिन निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में इलाज आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। मनमानी फीस, अनावश्यक जांच, महंगी दवाएं और लंबा बिल—इन सबने बीमारी को एक आर्थिक संकट में बदल दिया है। कई परिवार इलाज के लिए कर्ज़ लेने, ज़मीन बेचने या गहने गिरवी रखने तक को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बेहतर इलाज केवल अमीरों का अधिकार बनता जा रहा है?
स्वास्थ्य संकट का असर केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। परिवार पर मानसिक तनाव बढ़ता है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और भविष्य की योजनाएं टूट जाती हैं। एक गंभीर बीमारी पूरे परिवार को गरीबी की ओर धकेल सकती है। यह स्थिति सामाजिक असमानता को और गहरा करती है।
समस्या की जड़ केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की भी है। स्वास्थ्य को आज भी खर्च समझा जाता है, निवेश नहीं। जब तक स्वास्थ्य को मूलभूत अधिकार और सेवा के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक स्थिति में ठोस सुधार संभव नहीं है। सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना, डॉक्टरों और स्टाफ की संख्या बढ़ाना, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना और निजी क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण बेहद ज़रूरी है।
एक स्वस्थ समाज की कल्पना तभी साकार हो सकती है, जब इलाज आम नागरिक के लिए संघर्ष नहीं, बल्कि सहज अधिकार हो। स्वास्थ्य व्यवस्था को व्यापार नहीं, सेवा के रूप में देखने का समय आ चुका है। यदि समय रहते इस दिशा में गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो बीमारी केवल शरीर ही नहीं, पूरे समाज को कमजोर करती चली जाएगी।






