कविता गंगवार
महिलाओं की सुरक्षा आज भी भारतीय समाज की सबसे गंभीर और संवेदनशील चुनौतियों में से एक बनी हुई है। बीते वर्षों में कानून सख्त हुए हैं, नए नियम बने हैं और प्रशासनिक दावे भी बढ़े हैं, लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हो रहे। यह स्थिति साफ संकेत देती है कि समस्या केवल कानून की नहीं, बल्कि समाज की सोच और व्यवस्था की भी है।
घरेलू हिंसा आज भी महिलाओं के लिए सबसे बड़ा और छुपा हुआ संकट है। चार दीवारों के भीतर होने वाली प्रताड़ना अक्सर “पारिवारिक मामला” कहकर नजरअंदाज कर दी जाती है। शारीरिक हिंसा के साथ-साथ मानसिक और आर्थिक शोषण भी महिलाओं के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाता है। कई महिलाएं समाज, परिवार और बदनामी के डर से चुप रह जाती हैं।
सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़ और असुरक्षा की भावना महिलाओं के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुकी है। सड़क, बाजार, बस, ट्रेन—कोई भी जगह पूरी तरह सुरक्षित नहीं लगती। कामकाजी महिलाएं देर तक बाहर रहने को मजबूर होती हैं, लेकिन सुरक्षा के दावे ज़मीनी हकीकत से मेल नहीं खाते।
डिजिटल युग में साइबर अपराध महिलाओं के लिए नई चुनौती बनकर उभरे हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, धमकी, फर्जी अकाउंट और निजी तस्वीरों का दुरुपयोग महिलाओं की मानसिक शांति छीन रहा है। कानून मौजूद हैं, लेकिन शिकायत प्रक्रिया जटिल और डराने वाली होने के कारण कई पीड़ित सामने नहीं आ पातीं।
कार्यस्थलों पर भी महिलाओं की स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं कही जा सकती। यौन उत्पीड़न के खिलाफ नियम बने हैं, लेकिन कई संस्थानों में शिकायत तंत्र केवल कागजों तक सीमित है। नौकरी जाने का डर और सामाजिक दबाव महिलाओं को चुप रहने पर मजबूर करता है।
पुलिस और प्रशासन की भूमिका इस पूरे मुद्दे में बेहद अहम है। कई मामलों में संवेदनशीलता की कमी, शिकायत दर्ज करने में टालमटोल और पीड़िता से ही सवाल-जवाब करना भरोसे को कमजोर करता है। जब महिला को न्याय की राह में ही अपमान महसूस हो, तो डर और गहरा हो जाता है।
महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून बनाकर सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए सामाजिक बदलाव जरूरी है। बचपन से ही लड़कों और लड़कियों दोनों को समानता, सम्मान और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाना होगा। समाज को यह समझना होगा कि सवाल पीड़िता से नहीं, अपराधी से होना चाहिए।
महिलाओं की सुरक्षा कोई नारा नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी है। शिक्षा, संवेदनशील पुलिसिंग, मजबूत न्याय व्यवस्था और बदलती सोच के बिना न तो सम्मान संभव है और न ही सुरक्षा।
जब तक महिला निर्भय होकर जी नहीं पाएगी, तब तक समाज प्रगति का दावा नहीं कर सकता।

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