भरत चतुर्वेदी
भारतीय न्याय प्रणाली में “तारीख़ पर तारीख़” आज केवल एक संवाद नहीं, बल्कि आम नागरिक की पीड़ा का प्रतीक बन चुकी है। न्याय पाने की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल हो गई है कि कई बार इंसाफ मिलने से पहले ही पीड़ित की उम्मीद, संसाधन और हौसला टूट जाता है। अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते वर्षों बीत जाते हैं, लेकिन फैसला नहीं आता।
देश की अदालतों में आज करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। छोटे-छोटे विवाद भी सालों तक खिंचते रहते हैं। पीड़ित न्याय की आस में अदालतों की सीढ़ियाँ चढ़ता रहता है, जबकि दोषी और ताकतवर लोग सिस्टम की धीमी गति का लाभ उठाकर बच निकलते हैं। इससे न्याय का मूल सिद्धांत—सबके लिए समान न्याय—कमजोर होता जा रहा है।
गरीब और कमजोर वर्ग के लिए न्याय तक पहुंच और भी कठिन है। वकीलों की फीस, बार-बार की तारीखें, यात्रा खर्च और काम का नुकसान—ये सब मिलकर न्याय को महंगा बना देते हैं। कई लोग आर्थिक मजबूरी के कारण मुकदमा बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। यह स्थिति न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता को उजागर करती है।
न्याय में देरी का असर केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। जब लोगों को लगता है कि अदालत से समय पर न्याय नहीं मिलेगा, तो कानून के प्रति भरोसा कमजोर होने लगता है। यही कारण है कि कई बार लोग खुद ही फैसला करने पर उतर आते हैं, जिससे सामाजिक टकराव, हिंसा और अराजकता को बढ़ावा मिलता है।
न्यायपालिका पर बढ़ता बोझ भी इस संकट का बड़ा कारण है। जजों की भारी कमी, अदालतों की सीमित संख्या और बुनियादी ढांचे की कमजोरी ने व्यवस्था को जकड़ रखा है। एक-एक जज पर हजारों मामलों का दबाव है, जिससे त्वरित और गुणवत्तापूर्ण न्याय देना चुनौती बन गया है।
तकनीक का उपयोग न्याय प्रक्रिया को तेज़ करने में सहायक हो सकता है, लेकिन इसका प्रभावी क्रियान्वयन अभी अधूरा है। ई-कोर्ट, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और डिजिटल रिकॉर्ड जैसे प्रयास हुए हैं, लेकिन वे अभी आम नागरिक तक पूरी तरह पहुंच नहीं पाए हैं।
न्यायिक सुधार अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुके हैं।
अधिक अदालतों की स्थापना, जजों की शीघ्र नियुक्ति, वैकल्पिक विवाद समाधान (मध्यस्थता, लोक अदालत) को मजबूत करना और तकनीक का व्यापक उपयोग बेहद जरूरी है। साथ ही, प्रक्रिया को सरल और कम खर्चीला बनाना भी समय की मांग है।
न्याय केवल निर्णय नहीं, भरोसे की नींव होता है। अगर यह भरोसा टूटता है, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती हैं।
न्याय तभी सार्थक है, जब वह समय पर, सुलभ और निष्पक्ष मिले।

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