उत्तर प्रदेश युवा उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश उपाध्यक्ष अंकुर श्रीवास्तव के हस्तक्षेप से व्यापारियों को मिली बड़ी जीत
फर्रुखाबाद: नेहरू रोड पर लगने वाले संडे बाजार (Sunday market) को लेकर रविवार को उस समय विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई, जब पुलिस प्रशासन (police administration) ने व्यापारियों को बाजार लगाने से रोक दिया। यह मामला बीते कुछ दिनों से चला आ रहा था, जब संडे बाजार नेहरू रोड के अध्यक्ष नितिन गुप्ता से कोतवाली प्रभारी निरीक्षक द्वारा बाजार न लगाने को कहा गया था।
रविवार को जैसे ही संडे बाजार के व्यापारी नेहरू रोड पर बाजार लगाने पहुंचे, तभी मौके पर पहुंची पुलिस ने व्यापारियों को बाजार लगाने से साफ मना कर दिया और बाजार नहीं लगने दिया। अचानक हुई इस कार्रवाई से व्यापारियों में भारी रोष व्याप्त हो गया। सूचना मिलते ही उत्तर प्रदेश युवा उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश उपाध्यक्ष अंकुर श्रीवास्तव मौके पर पहुंचे और संडे बाजार के व्यापारियों के साथ सड़क पर धरने पर बैठ गए। देखते ही देखते माहौल गर्मा गया और व्यापारियों ने
“पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद”, “व्यापारी एकता जिंदाबाद”, “व्यापारी उत्पीड़न बंद करो”
जैसे जोरदार नारे लगाने शुरू कर दिए। धरने की सूचना पर घूमना चौकी इंचार्ज एवं पल्ला चौकी इंचार्ज भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और व्यापारियों से वार्ता शुरू की। काफी देर चली बातचीत के बाद पुलिस प्रशासन ने संडे बाजार को उसी स्थान पर लगाने की अनुमति दे दी। अनुमति मिलते ही व्यापारियों में खुशी की लहर दौड़ गई और धरना समाप्त कर दिया गया।

इस दौरान प्रदेश उपाध्यक्ष अंकुर श्रीवास्तव ने कहा कि उन्होंने पहले ही एक वीडियो जारी कर स्पष्ट कर दिया था कि यदि संडे बाजार को उसके निर्धारित स्थान पर नहीं लगाया गया, तो व्यापार मंडल कोतवाली फर्रुखाबाद का घेराव करेगा और धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर होगा। उन्होंने कहा कि यह व्यापारियों की एकजुटता का परिणाम है कि आज प्रशासन को अपना निर्णय बदलना पड़ा।
अंकुर श्रीवास्तव ने कहा कि यह संडे बाजार के व्यापारियों की बड़ी जीत है। यदि व्यापारियों का ऐसा ही सहयोग और एकता बनी रही, तो आगे भी इस प्रकार के कार्यक्रम होते रहेंगे और व्यापारियों के हक व सम्मान की लड़ाई निरंतर जारी रहेगी। संडे बाजार लगने की अनुमति मिलने के बाद व्यापारियों ने राहत की सांस ली और बाजार सामान्य रूप से संचालित हुआ। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि संगठित होकर किए गए आंदोलन से व्यापारियों की आवाज को अनसुना नहीं किया जा सकता।


