लखनऊ, रायबरेली और फतेहपुर के एआरटीओ के निलंबन की खबर को अगर सतह पर देखें तो यह शासन की सख्ती का संकेत लगती है। संदेश साफ दिखता है—अवैध खनन और अवैध परिवहन पर अब बर्दाश्त नहीं। लेकिन जब नजर झांसी की सड़कों पर जाती है, तो यह संदेश खोखला पड़ता नजर आता है। यहां अब भी बिना नंबर प्लेट के ट्रक दौड़ रहे हैं, रात के अंधेरे में खनन सामग्री की आवाजाही जारी है और कार्रवाई का असर जमीन पर दिखाई नहीं देता। यही विरोधाभास इस पूरे मामले की असल कहानी है।
यह सवाल अब केवल तीन एआरटीओ के निलंबन तक सीमित नहीं रहा। सवाल व्यवस्था का है। सवाल यह है कि क्या हम अवैधता के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ फाइलों और आदेशों तक सीमित रख रहे हैं? झांसी में हालात बताते हैं कि अवैध परिवहन कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। यह वर्षों से पनपा हुआ एक संगठित तंत्र है, जो समय के साथ और मजबूत होता गया है। जब कोई नेटवर्क इतना मजबूत हो जाता है, तो एक-दो अधिकारियों पर कार्रवाई उसे तोड़ नहीं पाती।
सबसे चिंताजनक पहलू कथित ‘सिंडिकेट’ की चर्चा है। खनन और परिवहन से जुड़े विभागों के कुछ लोगों, दलालों और कारोबारियों के बीच अगर आपसी तालमेल है, तो यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर गहरी सेंध है। ऐसे में चेकिंग अभियान पहले से लीक हो जाना, बिना नंबर प्लेट के ट्रकों का बेखौफ चलना और कार्रवाई के बाद भी स्थिति का जस का तस रहना—सब कुछ समझ में आने लगता है।
इस अवैध खेल का नुकसान बहुआयामी है। सरकार को राजस्व का भारी नुकसान होता है—वह पैसा जो सड़क, स्कूल और अस्पतालों पर खर्च हो सकता था। आम लोगों की जान जोखिम में पड़ती है—ओवरलोड और बिना पहचान वाले वाहन हादसों की आशंका बढ़ाते हैं। पर्यावरण की कीमत सबसे ज्यादा चुकानी पड़ती है—नदियों का सीना छलनी होता है, जमीन कमजोर होती है और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य दांव पर लग जाता है।
यहीं पर निलंबन की राजनीति पर सवाल खड़े होते हैं। क्या निलंबन केवल एक संदेश है, या किसी ठोस सुधार की शुरुआत? अगर निलंबन के बाद भी झांसी में कोई बदलाव नहीं दिखता, तो यह साफ करता है कि कार्रवाई अधूरी है। अधूरी कार्रवाई अक्सर व्यवस्था को और चालाक बना देती है—तरीके बदल जाते हैं, लेकिन खेल जारी रहता है।
अब जरूरत है प्रतीकात्मक कदमों से आगे बढ़ने की। सबसे पहले, जिलेवार स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, जो सिर्फ छोटे अधिकारियों तक सीमित न रहे। तकनीक का इस्तेमाल बढ़े—वाहनों की रियल-टाइम ट्रैकिंग, सीसीटीवी आधारित निगरानी और अचानक चेकिंग। सबसे अहम, जवाबदेही तय हो—जिस क्षेत्र में अवैध परिवहन पकड़ा जाए, वहां के जिम्मेदार अधिकारियों से सीधा सवाल हो और जवाब न मिलने पर कड़ी कार्रवाई हो।
साथ ही, जनता की भूमिका भी अहम है। स्थानीय लोगों की शिकायतें अगर समय पर दर्ज हों और उन पर कार्रवाई दिखे, तो भरोसा बनेगा। मीडिया और नागरिक समाज की सतत निगरानी से ही यह सुनिश्चित होगा कि मामला कुछ दिनों की सुर्खियों के बाद ठंडे बस्ते में न चला जाए।
अंत में, झांसी आज एक उदाहरण बन चुका है—एक ऐसी जगह, जहां यह परखा जा सकता है कि सरकार की मंशा कितनी मजबूत है। अगर यहां अवैध परिवहन पर सचमुच लगाम लगती है, तो संदेश पूरे प्रदेश में जाएगा। और अगर नहीं लगती, तो निलंबन जैसी खबरें केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगी।
जनता अब घोषणाएं नहीं, नतीजे चाहती है। सड़कों पर नियमों का पालन दिखे, अवैध ट्रक गायब हों और सिस्टम पारदर्शी नजर आए—यही असली सुधार की पहचान होगी।

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