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Friday, January 30, 2026

राजनीति का रंग और समय की चाल

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शरद कटियार

उत्तर प्रदेश की राजनीति (politics) में प्रतीक कभी साधारण नहीं होते। रंग, भाषा, मंच और तस्वीर—सबके अपने-अपने अर्थ होते हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी के मुखिया Akhilesh Yadav का भगवा नववर्ष पर संतों के साथ दिखाई देना केवल एक औपचारिक फोटो सेशन भर नहीं है, बल्कि यह बदलते राजनीतिक यथार्थ की ओर इशारा करता है।

अखिलेश यादव लंबे समय तक समाजवादी राजनीति के उस चेहरे के रूप में देखे जाते रहे, जो धर्म और आस्था से दूरी बनाए रखकर सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक विमर्श पर केंद्रित रहा। लेकिन समय के साथ राजनीति भी बदलती है और नेता भी। बीते कुछ वर्षों में यह साफ दिखाई देने लगा है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीकों की अनदेखी कर सत्ता का रास्ता आसान नहीं है।

राजनीति में आस्था की नई व्याख्या

भगवा रंग आज सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक सशक्त राजनीतिक संदेश भी है। ऐसे में जब अखिलेश यादव संतों के बीच, भगवा रंग के साथ नजर आते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह आस्था का सम्मान है या राजनीति की नई व्याख्या? संभवतः यह दोनों का मिश्रण है। लोकतंत्र में नेता वही सफल होता है, जो समाज के बदलते मनोविज्ञान को समझे। आज का मतदाता केवल जाति या वर्ग से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ाव महसूस करता है। ऐसे में सपा नेतृत्व का यह कदम उस दूरी को पाटने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है, जो पार्टी और बहुसंख्यक समाज के एक हिस्से के बीच बनी रही।

भाजपा इस दृश्य को अवसरवाद बताकर हमला कर रही है, जबकि सपा समर्थक इसे “समावेशी राजनीति” का नाम दे रहे हैं। सच यह है कि राजनीति में स्थायी विचारधाराएं भी समय के साथ अपने प्रस्तुतीकरण में बदलाव करती हैं। सवाल यह नहीं है कि भगवा किसने पहना, सवाल यह है कि उसके पीछे नीयत और नीति क्या है।

अगर यह बदलाव केवल चुनावी लाभ तक सीमित रहा, तो जनता इसे जल्द पहचान लेगी। लेकिन यदि इसके साथ सामाजिक संतुलन, आर्थिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखाई देती है, तो यह सपा की राजनीति में एक नया अध्याय भी हो सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति आज ऐसे दौर में है, जहां विचारधाराओं की दीवारें उतनी ठोस नहीं रहीं। हर दल अपने-अपने तरीके से “स्वीकार्यता” की राजनीति कर रहा है। अखिलेश यादव का संतों के साथ यह दृश्य उसी स्वीकार्यता की तलाश का प्रतीक माना जा सकता है।

संपादकीय दृष्टि से यह कहना गलत नहीं होगा कि यह तस्वीर आने वाले समय की राजनीति का संकेत है। अब लड़ाई केवल नारों की नहीं, प्रतीकों की भी है। अखिलेश यादव का भगवा नववर्ष पर संतों के साथ आना—यह तय करेगा कि सपा अपनी राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहती है। यह एक प्रयोग है, और राजनीति में हर प्रयोग का अंतिम फैसला जनता ही करती है।

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