उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में हर साल सर्दी के साथ कोहरा आता है, लेकिन बीते कुछ दिनों से यह कोहरा सिर्फ मौसम की खबर नहीं रह गया है, बल्कि लगातार हो रहे सड़क हादसों की वजह से एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक संकट बनता जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर ग्रामीण सड़कों तक, कोहरे में दृश्यता घटने के कारण रोज़ाना जानलेवा दुर्घटनाएं हो रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह केवल प्राकृतिक आपदा है या फिर हमारी लापरवाही और सिस्टम की नाकामी का नतीजा?
कोहरे के दौरान सड़क पर वाहन चलाना अपने आप में जोखिम भरा होता है, लेकिन ओवरस्पीडिंग, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, हाई बीम लाइट का गलत इस्तेमाल और तकनीकी सुरक्षा साधनों की कमी इस खतरे को कई गुना बढ़ा देती है। ट्रक, बस और निजी वाहन चालक अक्सर समय बचाने की होड़ में जान जोखिम में डालते हैं। नतीजा—कहीं कई वाहनों की टक्कर, कहीं मासूमों की मौत और कहीं परिवारों का उजड़ जाना।
दूसरी ओर प्रशासनिक तैयारियां हर साल की तरह अधूरी नजर आती हैं। कई राष्ट्रीय और राज्य मार्गों पर न तो पर्याप्त रिफ्लेक्टर लगे हैं, न चेतावनी संकेतक और न ही कोहरे के समय विशेष ट्रैफिक कंट्रोल की व्यवस्था। कोहरा छाने के बावजूद भारी वाहनों की आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होता। ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी भी अधिकतर हादसे के बाद ही दिखती है, पहले नहीं।
यह भी चिंता का विषय है कि जागरूकता अभियानों का असर जमीन पर दिखाई नहीं देता। कोहरे में धीमी गति, फॉग लाइट का सही प्रयोग, सुरक्षित दूरी बनाए रखना और अनावश्यक यात्रा से बचने जैसे नियम कागजों तक सीमित हैं। आम नागरिक इन्हें गंभीरता से नहीं लेता और प्रशासन इन्हें सख्ती से लागू नहीं करता।
समय आ गया है कि कोहरे में सड़क सुरक्षा को मौसमी औपचारिकता नहीं, बल्कि आपात स्थिति के रूप में लिया जाए। कोहरे के दौरान गति सीमा सख्ती से लागू हो, हाईवे पर पेट्रोलिंग बढ़ाई जाए, संवेदनशील इलाकों में अस्थायी ट्रैफिक रोक या डायवर्जन किया जाए और आधुनिक तकनीक जैसे डिजिटल साइन बोर्ड व चेतावनी सिस्टम का उपयोग हो। साथ ही वाहन चालकों को भी यह समझना होगा कि कुछ मिनट की देरी, पूरी जिंदगी की कीमत से कहीं सस्ती है।
कोहरा प्रकृति की देन है, लेकिन उसमें होने वाली मौतें नहीं। अगर अभी भी हम नहीं चेते, तो हर सर्द सुबह सिर्फ ठंड ही नहीं, एक नई दुर्घटना की खबर भी लेकर आएगी। सड़क पर सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सावधानी हर नागरिक की। यही संतुलन हमें इस जानलेवा कोहरे से बाहर निकाल सकता है।

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