प्रभात यादव
भारतीय राजनीति के आकाश में जिन व्यक्तित्वों ने विचार, व्यवहार और विवेक—तीनों से अपनी अमिट छाप छोड़ी, उनमें अटल बिहारी वाजपेयी का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। वे केवल तीन बार देश के प्रधानमंत्री ही नहीं रहे, बल्कि ऐसे राजनेता थे जिन्हें विपक्ष भी सम्मान देता था। सत्ता और संवेदना का ऐसा संतुलन भारतीय राजनीति में विरल है।
अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ। पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी अध्यापक थे। बचपन से ही अटल जी में वाकपटुता, साहित्य प्रेम और राष्ट्रचिंतन के बीज अंकुरित हो चुके थे। छात्र जीवन में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और वहीं से उनके जीवन को दिशा मिली।
अटल जी का राजनीतिक सफर भारतीय जनसंघ से शुरू हुआ। वे जल्द ही एक तेजस्वी वक्ता के रूप में उभरे। संसद में उनके भाषण केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक और नैतिक दस्तावेज माने जाते थे। पंडित नेहरू तक उनकी भाषण शैली से प्रभावित थे और कहा था,“यह युवक एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।”
प्रधानमंत्री के रूप में अटल युग
अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन 1999 से 2004 तक का कार्यकाल भारतीय राजनीति का निर्णायक दौर माना जाता है।
इस काल में पोखरण परमाणु परीक्षण कर भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया,
स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना से देश के बुनियादी ढांचे को नई गति दी
अमेरिका, पाकिस्तान और रूस जैसे देशों से संतुलित विदेश नीति अपनाई,
सुशासन, संवाद और सहमति की राजनीति को बढ़ावा दिया।
वे कहते थे,“हम सत्ता के लिए नहीं, राष्ट्र के लिए राजनीति करते हैं।”
कवि हृदय प्रधानमंत्री अटल जी केवल राजनेता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कवि भी थे। उनकी कविताओं में राष्ट्र, संघर्ष, प्रेम और आशा के स्वर गूंजते हैं “चीर निशा का वक्ष, पुनः चमकेगा दिनकर”
उनकी कविताएं आज भी युवाओं को हार न मानने की प्रेरणा देती हैं।
लखनऊ से आत्मीय रिश्ता अटल बिहारी वाजपेयी का लखनऊ से विशेष और भावनात्मक रिश्ता रहा। वे यहां से कई बार सांसद चुने गए। लखनऊ केवल उनका निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि राजनीतिक कर्मभूमि थी। आज भी लखनऊ में उनकी स्मृतियों को संजोने के लिए कई स्थल और संस्थान हैं।
अजातशत्रु की राजनीति
अटल जी को राजनीति का अजातशत्रु कहा गया, क्योंकि उन्होंने कभी कटुता को अपना हथियार नहीं बनाया। विरोध में भी शालीनता, आलोचना में मर्यादा और सत्ता में विनम्रता—यही उनकी पहचान रही। वे लोकतंत्र को संवाद से मजबूत करने वाले नेता थे।
अंतिम समय और अमर विरासत
16 अगस्त 2018 को अटल बिहारी वाजपेयी भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके विचार, मूल्य और आदर्श आज भी जीवित हैं। 25 दिसंबर को उनका जन्मदिन सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो उनके विचारों की जीवंतता का प्रमाण है।
अटल बिहारी वाजपेयी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा, एक संस्कार और एक युग थे।
वे हमें सिखाते हैं कि,राजनीति में रहकर भी संवेदनशील, सुसंस्कृत और राष्ट्रनिष्ठ कैसे रहा जाता है।आज जब देश नेतृत्व, संवाद और सुशासन की बात करता है, तो हर रास्ता कहीं न कहीं अटल जी के विचारों से होकर गुजरता है।

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