मारपीटके आरोपों पर कोर्ट ने संज्ञान लिया, पुलिसकर्मी फँसने के आसार
देवरिया। पूर्व आईपीएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता अमिताभ ठाकुर की गिरफ़्तारी अब पुलिस विभाग के लिए ही संकट का कारण बनती दिख रही है। देवरिया के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय ने अमिताभ ठाकुर की उस तहरीर को स्वीकार कर लिया है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि गिरफ़्तारी के समय पुलिस ने उनके साथ मारपीट की, उनका चश्मा तोड़ दिया गया और उनके साथ अमर्यादित व्यवहार किया गया।
इस पूरे मामले में सबसे अहम तथ्य यह है कि मेडिकल रिपोर्ट में डॉक्टर द्वारा चोटों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। यह रिपोर्ट अमिताभ ठाकुर के आरोपों की पुष्टि करती प्रतीत होती है। एक 52–55 किलो वजन वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी के साथ इस प्रकार का व्यवहार न केवल मानवीय मूल्यों पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
मामले में चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब पुलिस ने अपनी ही रिपोर्ट में यह स्वीकार किया कि गिरफ्तारी के समय “हल्का बल प्रयोग” किया गया। यही स्वीकारोक्ति अब संबंधित पुलिसकर्मियों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल बन सकती है, क्योंकि कानून में बल प्रयोग की भी स्पष्ट सीमाएं तय हैं—खासतौर पर तब, जब आरोपी निहत्था हो, शारीरिक रूप से कमजोर हो और कोई प्रतिरोध न कर रहा हो।
न्यायालय ने इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक देवरिया को 10 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अब यह रिपोर्ट तय करेगी कि गिरफ्तारी में शामिल पुलिसकर्मियों पर विभागीय और कानूनी कार्रवाई होगी या नहीं।
सवाल जो सिस्टम से टकरा रहे हैं
क्या कानून सबके लिए समान है?
क्या एक पूर्व आईपीएस अधिकारी के साथ भी पुलिस ऐसा व्यवहार कर सकती है?
अगर यही व्यवहार किसी आम नागरिक के साथ हुआ होता, तो उसकी आवाज़ कौन सुनता?
अमिताभ ठाकुर वर्षों से पुलिस सुधार, मानवाधिकार और पारदर्शिता की बात करते रहे हैं। ऐसे व्यक्ति के साथ गिरफ्तारी के समय मारपीट और अपमान का आरोप पूरे सिस्टम की आत्मा को झकझोर देता है। यह मामला अब केवल एक व्यक्ति का नहीं रहा, बल्कि पुलिस की जवाबदेही, मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा बन चुका है।
देवरिया कोर्ट में स्वीकार की गई तहरीर, मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज चोटें और पुलिस की अपनी स्वीकारोक्ति—तीनों मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि गिरफ्तारी में शामिल पुलिसकर्मी गंभीर कानूनी पचड़े में फँस सकते हैं।अब निगाहें टिकी हैं एसपी की रिपोर्ट पर, जो यह तय करेगी कि कानून की मर्यादा बचाई जाएगी या वर्दी की आड़ में सब कुछ दबा दिया जाएगा।


