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Thursday, February 19, 2026

लेखन की कला को भूल जाने वाली पीढ़ी

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डॉ विजय गर्ग

डिजिटल युग ने हमारे जीवन को तेज़, सुविधाजनक और तकनीक-प्रधान बना दिया है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और त्वरित संदेशों के इस दौर में संवाद पहले से कहीं आसान हुआ है, लेकिन इसी के साथ लेखन की कला धीरे-धीरे हाशिए पर जाती दिखाई दे रही है। आज की पीढ़ी शब्दों को गढ़ने, भावों को विस्तार देने और विचारों को सहेजने की कला को भूलती जा रही है।

 

पहले लोग पत्र लिखते थे, डायरी रखते थे और अपने अनुभवों को शब्दों में पिरोते थे। लेखन केवल सूचना देने का साधन नहीं था, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति और चिंतन का माध्यम था। आज लंबे पत्रों की जगह छोटे संदेश, इमोजी और वॉइस नोट्स ने ले ली है। भावनाओं की गहराई कुछ प्रतीकों और संक्षिप्त वाक्यों तक सीमित हो गई है।

 

हस्तलेखन का महत्व भी कम होता जा रहा है। काग़ज़ और कलम की जगह कीबोर्ड और टचस्क्रीन ने ले ली है। जबकि शोध बताते हैं कि हाथ से लिखने से स्मरण शक्ति बढ़ती है, एकाग्रता सुधरती है और रचनात्मकता विकसित होती है। जब बच्चे लिखना कम करते हैं, तो सोचने और समझने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

 

पढ़ने की आदत में आई कमी भी लेखन की गिरावट का एक बड़ा कारण है। लेखन और पठन एक-दूसरे के पूरक हैं। जब पढ़ना केवल सोशल मीडिया पोस्ट और सुर्खियों तक सीमित रह जाता है, तो शब्द-भंडार सिकुड़ने लगता है। अच्छे पाठक के बिना अच्छा लेखक बनना कठिन है।

 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालित लेखन उपकरणों का बढ़ता उपयोग भी चिंता का विषय है। ये साधन सहायक हो सकते हैं, लेकिन इन पर अत्यधिक निर्भरता मौलिक सोच को कमजोर करती है। विचारों को स्वयं शब्दों में ढालने का संघर्ष ही लेखन को सशक्त बनाता है।

 

लेखन की कला का लुप्त होना केवल भाषा का नुकसान नहीं है, बल्कि विचारों की स्पष्टता, संवेदनशीलता और संवाद की गुणडवत्ता का भी ह्रास है। जिस समाज में लोग अपने विचार ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते, वहाँ विमर्श और समझ भी कमजोर पड़ जाती है।

 

लेखन की कला को बचाने के लिए तकनीक से दूरी बनाना आवश्यक नहीं, बल्कि संतुलन ज़रूरी है। विद्यालयों में रचनात्मक लेखन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, माता-पिता बच्चों को लिखने के लिए प्रेरित करें, और युवाओं को यह समझना होगा कि शब्दों में अपनी बात कहने का आनंद अद्वितीय है।

 

लेखन की कला पुरानी नहीं हुई है, वह केवल उपेक्षित हो गई है। यदि इस पीढ़ी ने इसे पूरी तरह भुला दिया, तो यह केवल शब्दों की नहीं, बल्कि सोच और संवेदना की भी क्षति होगी।

सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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