उत्तर प्रदेश में कोडीन युक्त कफ सिरप कांड अब एक साधारण आपराधिक घटना नहीं रहा, बल्कि यह प्रदेश की प्रशासनिक सतर्कता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी—तीनों की कठोर परीक्षा बन चुका है। जिस तरह से यह मामला दिन-प्रतिदिन तूल पकड़ रहा है, उससे यह साफ होता जा रहा है कि यह केवल कुछ तस्करों की करतूत नहीं, बल्कि सिस्टम की खामियों में पनपा एक संगठित नेटवर्क है।
अब तक सामने आए आंकड़े चौंकाने वाले हैं। राज्यभर में 75 से अधिक गिरफ्तारियां, 12.65 लाख बोतल अवैध कोडीन सिरप की बरामदगी और 132 दवा फर्मों के खिलाफ कार्रवाई यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अवैध कारोबार किस पैमाने पर चल रहा था। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ है कि यह नेटवर्क केवल एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं था, बल्कि कई जिलों और पड़ोसी राज्यों तक इसकी जड़ें फैली हुई थीं।
सबसे बड़ा और असहज सवाल यही है कि जब लाखों बोतलें तैयार हो रही थीं, गोदामों में जमा थीं, ट्रकों से ढोई जा रही थीं और बाजार तक पहुंचाई जा रही थीं—तब ड्रग कंट्रोल विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और स्थानीय प्रशासन क्या कर रहा था?क्या यह केवल लापरवाही थी, या फिर आंख मूंदकर देखना जानबूझकर किया गया?
दवा निर्माण और वितरण जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इतनी बड़ी गड़बड़ी बिना आंतरिक मिलीभगत के संभव नहीं हो सकती। यदि दवा फर्में नियमों को ताक पर रखकर कोडीन युक्त सिरप का उत्पादन और सप्लाई कर रही थीं, तो उनकी निगरानी करने वाली एजेंसियां क्यों असफल रहीं,यह सवाल आज भी जवाब मांग रहा है।
युवाओं पर सबसे बड़ा खतरा
कोडीन सिरप का अवैध कारोबार सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य पर सीधा हमला है। सस्ती कीमत और “दवा” के नाम पर मिलने वाला यह नशा तेजी से स्कूल–कॉलेज के छात्रों और बेरोजगार युवाओं को अपनी गिरफ्त में ले रहा है।
यह स्थिति बताती है कि मामला केवल अपराध का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का भी है, जिसे अब तक गंभीरता से नहीं लिया गया।
आरोप-प्रत्यारोप भी तेज होते चले गए। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर संरक्षण, मिलीभगत और ढीली कार्रवाई के आरोप लगा रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस शोरगुल में पीड़ित समाज और नशे में धकेले जा रहे युवा कहीं पीछे छूट जाते हैं।
खतरा यह भी है कि कहीं यह मामला सिर्फ निचले स्तर के तस्करों और कर्मचारियों तक सिमट न जाए और असली लाभार्थी, बड़े कारोबारी या राजनीतिक संरक्षण देने वाले लोग जांच के दायरे से बाहर न निकल जाएं। यदि ऐसा हुआ, तो यह कार्रवाई नहीं बल्कि केवल दिखावटी सख्ती कहलाएगी।
इस कांड से निपटने के लिए अब आधे-अधूरे कदम नहीं, बल्कि कठोर और पारदर्शी कार्रवाई की जरूरत है,साथ ही दवा निर्माण से लेकर बिक्री तक पूरी सप्लाई चेन की ऑडिट और डिजिटल ट्रैकिंग,
दोषी फर्मों के लाइसेंस रद्द कर आर्थिक दंड और जेल की सजा का प्रविधान,लापरवाह या संलिप्त अधिकारियों पर सीधी जवाबदेही
युवाओं के लिए नशा मुक्ति, काउंसलिंग और जागरूकता अभियान का क्योंकि
कोडीन कांड उत्तर प्रदेश के लिए एक चेतावनी है। यह बताता है कि अगर समय रहते सिस्टम को दुरुस्त नहीं किया गया, तो नशे का यह जाल समाज की जड़ों को खोखला कर देगा।
आज जरूरत इस बात की है कि इस मामले को राजनीति के चश्मे से नहीं, न्याय और जनहित के नजरिए से देखा जाए।
अगर दोषियों तक बिना भेदभाव के कार्रवाई होती है, तो यह एक मिसाल बनेगी।
और यदि यह मामला भी फाइलों और बयानों में दब गया, तो संदेश साफ होगा यहां नशे का नेटवर्क कानून से ज्यादा ताकतवर है।

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