देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार वजह है उसका नाम बदलने की पहल। सरकार इसे “नए भारत” की सोच से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे प्रतीकात्मक राजनीति बता रहा है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि योजना का नाम क्या होगा, बल्कि यह है कि ग्रामीण गरीब को काम, मजदूरी और सम्मान समय पर मिलेगा या नहीं।
मनरेगा कोई साधारण योजना नहीं है। यह करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए अंतिम सुरक्षा कवच है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 14 करोड़ जॉब कार्ड जारी हैं और हर साल 5 से 6 करोड़ परिवार इससे जुड़े रहते हैं। कानून में 100 दिन रोजगार की गारंटी है, लेकिन सच्चाई यह है कि बीते वर्षों में औसतन 50–55 दिन का ही काम लोगों को मिल पाया है। कई राज्यों में मजदूरी भुगतान में देरी आज भी एक गंभीर समस्या है।
ऐसे में नाम बदलने की कवायद कई सवाल खड़े करती है। क्या नाम बदलने से रोजगार के दिन बढ़ जाएंगे? क्या इससे मजदूरी समय पर मिलने लगेगी? क्या पंचायत स्तर पर काम की उपलब्धता सुधरेगी? यदि इन सवालों का जवाब “हां” नहीं है, तो फिर यह बदलाव केवल कागज़ी साबित होगा।
सरकार का तर्क है कि नाम परिवर्तन के साथ योजना को ज्यादा व्यापक बनाया जाएगा और ग्रामीण आजीविका पर फोकस बढ़ेगा। यह उद्देश्य गलत नहीं है, लेकिन अनुभव बताता है कि नीतियों की सफलता नाम से नहीं, क्रियान्वयन से तय होती है। यदि वास्तव में सरकार गंभीर है, तो उसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि 100 दिन का रोजगार वास्तविकता बने, मजदूरी बढ़े और भुगतान में देरी पूरी तरह खत्म हो।
विपक्ष का यह कहना भी पूरी तरह निराधार नहीं है कि नाम बदलना मूल समस्याओं से ध्यान हटाने का तरीका हो सकता है। महात्मा गांधी का नाम हटाने या जोड़ने की बहस से ज़्यादा जरूरी यह है कि गांव का मजदूर भूखा न सोए और उसे काम के लिए शहर की ओर पलायन न करना पड़े।
आज जरूरत इस बात की है कि मनरेगा को राजनीतिक बहस का विषय बनाने के बजाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का सशक्त औजार बनाया जाए। अगर नाम बदलने के साथ-साथ रोजगार के दिन बढ़ते हैं, मजदूरी सम्मानजनक होती है और भुगतान समय पर होता है, तो कोई भी बदलाव स्वागत योग्य होगा। लेकिन यदि बदलाव केवल नाम तक सीमित रहा, तो इतिहास इसे एक और अवसर की चूक के रूप में याद रखेगा।
आखिरकार सवाल नाम का नहीं, नीयत और नतीजे का है।


