योगी के बयान ने भाजपा की अंदरूनी राजनीति को किया उजागर, सपा को दिखा सत्ता का रास्ता
शरद कटियार
मतदाता पुनरीक्षण कार्यक्रम (SIR) को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि उत्तर प्रदेश में करीब 4 करोड़ मतदाताओं के नाम कम कर दिए गए, कोई सामान्य प्रशासनिक टिप्पणी नहीं है। यह बयान सीधे-सीधे भारतीय जनता पार्टी के भीतर चल रही सत्ता, नेतृत्व और भविष्य की राजनीति की ओर इशारा करता है। राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा की अंदरखाने चल रही खींचतान का सार्वजनिक संकेत माना जा रहा है।
भाजपा के इतिहास पर नजर डालें तो यह पहला मौका नहीं है जब अंदरूनी गुटबाजी का खामियाजा पार्टी को चुनावी रूप से भुगतना पड़ा हो। पूर्व में भी इसी तरह की राजनीतिक असहजता का लाभ समाजवादी पार्टी को मिला था और उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा, जिसका परिणाम यह रहा कि 37 लोकसभा सीटें सपा के खाते में चली गईं। ऐसे में मतदाता पुनरीक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर मुख्यमंत्री का खुला बयान राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज केवल उत्तर प्रदेश के नेता नहीं रह गए हैं। उनकी छवि राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों तक बनी है। कानून-व्यवस्था, सख्त प्रशासन और स्पष्ट वैचारिक रुख ने उन्हें देश के प्रभावशाली नेताओं की पंक्ति में खड़ा कर दिया है। उनके समर्थक उन्हें खुले तौर पर भविष्य का प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानते हैं। यही बात भाजपा के भीतर कुछ वर्गों को असहज भी करती है।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़ती उम्र को लेकर भाजपा के भीतर भविष्य के नेतृत्व पर चर्चाएं तेज हो चुकी हैं। शीर्ष नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले कुछ नेताओं के बीच इसको लेकर अस्पष्टता और उहापोह की स्थिति देखी जा रही है। योगी आदित्यनाथ का मतदाता पुनरीक्षण पर आया बयान इसी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है, जिसने अंदरखाने चल रही अंतरकलह को सतह पर ला दिया।
इस पूरे घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी ने तुरंत राजनीतिक हमला बोला। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि “महाराजगंज में ही दूसरा बड़ा नेता तैयार कर दिया गया है।” इस बयान को सिर्फ व्यंग्य नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर नेतृत्व संघर्ष की ओर सीधा संकेत माना जा रहा है। सपा खेमे में इसे भाजपा की कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगर 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उत्तर प्रदेश में कमजोर पड़ती है, तो उसका असर केवल लखनऊ तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा झटका दिल्ली की सत्ता तक महसूस किया जाएगा और केंद्र की गद्दी किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं मानी जाएगी। यही वजह है कि सपा इस घटनाक्रम को अवसर के रूप में देख रही है और अंदर ही अंदर उत्साहित नजर आ रही है।
वहीं दूसरा परिदृश्य भी उतना ही अहम है। यदि योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर भाजपा 2027 में फिर सरकार बनाती है, तो यह लगभग तय माना जा रहा है कि केंद्र की राजनीति में लाल वस्त्रधारी नेता की दावेदारी बेहद मजबूत हो जाएगी। यही कारण है कि मतदाता पुनरीक्षण का मुद्दा अब केवल वोटर लिस्ट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रधानमंत्री पद की राजनीति से भी जुड़ता नजर आ रहा है।
कुल मिलाकर, मतदाता पुनरीक्षण पर उठा सवाल भाजपा के लिए चेतावनी है और विपक्ष के लिए अवसर। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि भाजपा इस अंदरूनी राजनीतिक संदेश को कितनी गंभीरता से लेती है या यह मुद्दा एक बार फिर विपक्ष को सत्ता की सीढ़ी चढ़ने का मौका दे देता है।

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