— इंजी. विकास कटियार
आज की डिजिटल दुनिया में किशोर हर समस्या का हल मोबाइल और इंटरनेट पर खोजते हैं। पढ़ाई से लेकर निजी परेशानियों तक, एआई चैटबॉट्स उनसे हर समय बात करने के लिए उपलब्ध रहते हैं। लेकिन मानसिक संकट की स्थिति में यही चैटबॉट्स किशोरों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।
किशोरावस्था भावनात्मक रूप से संवेदनशील समय होता है। घर का दबाव, स्कूल की चिंता, दोस्तों से दूरी और सोशल मीडिया का तनाव किशोरों को अकेला महसूस कराता है। ऐसे में वे बिना डर और जजमेंट के बात करने के लिए एआई चैटबॉट्स पर भरोसा करने लगते हैं।
समस्या यह है कि एआई न तो डॉक्टर है और न ही प्रशिक्षित काउंसलर। गंभीर मानसिक परेशानी को वह सामान्य समझ सकता है और गलत या अधूरी सलाह दे सकता है। एआई किशोरों की भावनाओं, संकेतों और दर्द की गहराई को ठीक से नहीं समझ पाता। इससे संकट और बढ़ सकता है।
एक बड़ा खतरा निजी जानकारी का भी है। किशोर अपनी भावनाएं और निजी बातें चैटबॉट्स से साझा कर देते हैं, लेकिन यह डेटा कैसे और कहाँ इस्तेमाल होगा, इस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता।
एआई का दोस्ताना व्यवहार किशोरों को यह भ्रम देता है कि कोई उन्हें समझ रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि एआई के पास न संवेदना होती है और न मानवीय निर्णय क्षमता। संकट की स्थिति में यह भरोसा नुकसानदेह हो सकता है।
किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए मानवीय सहयोग सबसे जरूरी है। माता-पिता, शिक्षक और प्रशिक्षित काउंसलर ही उन्हें सही सहारा दे सकते हैं। एआई केवल जानकारी देने या मार्गदर्शन तक सीमित रहना चाहिए, वह कभी भी मानसिक स्वास्थ्य सहायता का विकल्प नहीं बन सकता।
निष्कर्ष साफ है एआई मददगार हो सकता है, लेकिन किशोरों के संकट में इंसान ही सबसे बड़ा सहारा है।






