नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को कर्नाटक भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री (former Deputy Chief Minister) आर अशोक के खिलाफ 2018 में भूमि पर अवैध कब्जे को नियमित करने से संबंधित कथित घोटाले में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति संजय करोल और विपुल एम पंचोली की पीठ ने टिप्पणी की, अपीलकर्ता के खिलाफ की गई कार्रवाई प्रथम दृष्टया राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रतीत होती है।
पीठ ने कहा, राज्य सरकार सार्वजनिक भूमि का अंधाधुंध या मनमाने ढंग से आवंटन नहीं कर सकती; उसके निर्णय तर्कसंगत मानदंडों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और कमजोर वर्गों के कल्याण को बढ़ावा देने के संवैधानिक दायित्व से स्पष्ट रूप से जुड़े होने चाहिए। पीठ ने अशोक की अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय के 25 सितंबर, 2018 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
अपील को स्वीकार करते हुए, पीठ ने टिप्पणी की कि जब सरकार आर्थिक रूप से वंचित लोगों को भूमि आवंटित करती है, तो वह अपने कल्याणकारी दायित्वों के दायरे में कार्य करती है और उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आवंटन जनहित में हो, समानता के मानदंडों का अनुपालन करे और सार्वजनिक शक्ति के विवेकपूर्ण प्रयोग को प्रतिबिंबित करे।
पीठ ने कहा, इन सिद्धांतों से किसी भी प्रकार का विचलन न केवल वितरणात्मक न्याय की संवैधानिक परिकल्पना को कमजोर करेगा, बल्कि विवादित कार्रवाई को मनमानी के आधार पर अमान्य घोषित किए जाने का जोखिम भी पैदा करेगा। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि जब राज्य आर्थिक रूप से वंचित व्यक्तियों के पक्ष में भूमि का आवंटन करता है, तो यह कार्य दान का कार्य नहीं है, बल्कि एक कल्याणकारी राज्य पर निहित संवैधानिक दायित्व का निर्वहन है।
पीठ ने कहा कि एक ऐसे राष्ट्र में, जिसकी विशेषता विशाल जनसंख्या और कृषि आधारित आजीविका पर निरंतर निर्भरता है, भूमि का महत्व बढ़ जाता है और यह एक महत्वपूर्ण और दुर्लभ संसाधन है, जो अक्सर समाज के कमजोर वर्गों के लिए जीविका का एकमात्र साधन होता है।


