मेरठ। ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम ‘सेवा तीर्थ’ रखे जाने पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने इसे राजनीतिक और धार्मिक शब्दावली का गलत मिश्रण बताते हुए कहा कि तीर्थ एक पवित्र और धार्मिक अवधारणा से जुड़ा शब्द है, जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय एक प्रशासनिक संस्था है। उन्होंने सवाल उठाया कि पीएमओ में ऐसा कौन सा तीर्थ है, जहां जाने से पाप धुलते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय में विभिन्न धर्मों के लोग कार्य करते हैं और चमड़े के जूते पहनकर आते-जाते हैं, ऐसे में उस स्थान को ‘तीर्थ’ कहना अनुचित है। जरूरत पड़ी तो इस मामले में न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।
शहर में तीन दिवसीय प्रवास पर आए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शनिवार को गांधी आश्रम के पास श्री कृष्णबोधाश्रम दंडी आश्रम में चल रहे निर्माण कार्य का निरीक्षण किया। इसके बाद मवाना रोड स्थित डिफेंस कॉलोनी में सुदीप अग्रवाल के निवास पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने अयोध्या राम मंदिर में ध्वजारोहण समारोह को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भारत के किस मंदिर में चमड़े के जूते पहनकर धर्म ध्वजा फहराई जाती है, यह परंपरा के विपरीत है और गलत हुआ है।
उन्होंने घुसपैठियों के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा कि जब लंबे समय से भाजपा की सरकार है, तो फिर घुसपैठियों पर अब तक सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई। भाजपा शासन में ही घुसपैठिए कैसे अंदर आ गए, यह भी सवालों के घेरे में है। वहीं एसआईआर को सही ठहराते हुए उन्होंने गोमाता को राष्ट्रीय माता घोषित करने और गोहत्या निरोधी कानून को सख्ती से लागू कराने के लिए देशभर में चल रहे जागरूकता अभियान की जानकारी दी।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि गो रक्षा के लिए शपथ और संकल्प के तहत बिहार में 243 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी उतारे गए थे, जिनमें से 45 प्रत्याशियों ने नाम वापस लिया, जबकि 198 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा। औसतन प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में करीब तीन हजार वोट मिले। इसी तर्ज पर आगामी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भी प्रत्येक सीट पर गोसेवक प्रत्याशी उतारे जाएंगे। उन्होंने कहा कि यदि सरकार संत समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं करती है तो संत खुलकर अपनी बात रखेंगे। इसके लिए अगले वर्ष मार्च में दिल्ली में संतों की बड़ी सभा बुलाई गई है।
बद्रीनाथ धाम यात्रा को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि शीतकाल में कपाट बंद होने का मतलब यह नहीं कि पूजा-अर्चना रुक जाती है। शीतकाल में भी नियमित पूजन जारी रहता है और श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसी गलत धारणा को दूर करने के लिए बीते तीन वर्षों से शीतकालीन यात्रा की शुरुआत की गई है।






