ड्राइवरों की भारी कमी से ठप होती यूपी रोडवेज: लखनऊ परिक्षेत्र में 150 बसें डिपो में खड़ी, हजारों यात्री रोज परेशान

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लखनऊ| प्रदेश परिवहन निगम के लखनऊ परिक्षेत्र में रोडवेज बसों के संचालन पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। हालात ऐसे हैं कि बसें मौजूद हैं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए ड्राइवर नहीं मिल रहे। चालकों के अभाव में रोजाना करीब 150 बसें डिपो में खड़ी रह जाती हैं, जिससे यात्रियों को सड़कों पर भटकना पड़ रहा है। हालिया तैयार की गई विभागीय रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि लखनऊ परिक्षेत्र में इस समय 102 चालकों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन रोजगार मेलों के आयोजन के बावजूद एक भी चालक ने कार्यभार ग्रहण नहीं किया।

रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेशभर में उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के 20 परिक्षेत्रों में कुल 11,129 बसें संचालित होनी हैं। इनके संचालन के लिए 19,564 चालक तैनात हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रतिदिन औसतन ढाई हजार से अधिक बसें चालकों के अभाव में सड़कों पर नहीं उतर पा रही हैं। संविदा चालकों की भर्ती के लिए पूरे वर्ष अलग-अलग परिक्षेत्रों में रोजगार मेले आयोजित किए गए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। लखनऊ परिक्षेत्र की स्थिति इनमें सबसे अधिक बदहाल पाई गई है।

लखनऊ में कुल 594 बसें हैं और 1,181 चालक कार्यरत हैं, इसके बावजूद 102 चालकों की कमी बनी हुई है। इस कमी को पूरा करने के लिए आयोजित पहले टेस्ट में 36 अभ्यर्थी पास हुए, जबकि दूसरे टेस्ट में एक भी उम्मीदवार सफल नहीं हुआ। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि पास होने के बावजूद किसी भी चालक ने अब तक कार्यभार ग्रहण नहीं किया। प्रदेशभर की बात करें तो कुल 3,243 संविदा चालकों की आवश्यकता है, लेकिन अब तक सिर्फ 684 चालकों ने ही ज्वाइन किया है, जबकि पहले टेस्ट में 1,806 और दूसरे में 937 अभ्यर्थी पास हुए थे।

लखनऊ परिक्षेत्र में क्षेत्रीय प्रबंधक आरके त्रिपाठी के निर्देशन में दो रोजगार मेलों का आयोजन किया गया था। इनमें क्रमशः 204 और 120 पदों पर भर्ती निकाली गई, यानी कुल 324 पदों के सापेक्ष महज 111 आवेदन ही प्राप्त हुए। अधिकारियों का कहना है कि पदों की संख्या जानबूझकर अधिक रखी गई थी, ताकि प्रक्रिया के दौरान छंटनी के बाद भी 102 रिक्त पदों के अनुसार पर्याप्त चालक मिल सकें, लेकिन परिणाम शून्य रहा।

चालकों की कमी का सीधा असर यात्रियों पर पड़ रहा है। प्रदेशभर में प्रतिदिन 2,400 से अधिक बसें खड़ी रह रही हैं, जिनमें से अकेले लखनऊ परिक्षेत्र में औसतन 150 बसें डिपो से बाहर नहीं निकल पातीं। इससे हर महीने करीब 5.40 लाख यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। यह स्थिति केवल साधारण बसों तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग 200 लग्जरी बसें भी ड्राइवरों के अभाव में संचालित नहीं हो पा रही हैं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि लखनऊ के अलावा हरदोई, मुरादाबाद और आगरा जैसे परिक्षेत्रों में भी हालात चिंताजनक हैं, जहां एक भी चालक नहीं मिला। मुरादाबाद में 332, आगरा में 237 और हरदोई में 86 पद रिक्त हैं। हालांकि गाजियाबाद, गोरखपुर और अयोध्या जैसे कुछ परिक्षेत्रों में आंशिक सफलता मिली है, लेकिन वहां भी जरूरत के मुकाबले भर्ती काफी कम है।

ड्राइवरों के न मिलने के पीछे संविदाकर्मियों की समस्याओं की अनदेखी, ड्यूटी लगाने में कथित वसूली, चालान की भरपाई और वेतन से कटौती जैसे कारण गिनाए जा रहे हैं। इसके अलावा वर्दी और अन्य मदों में मिलने वाला पैसा न मिलने की शिकायतें भी सामने आई हैं। दूसरी ओर, प्राइवेट बसों में अधिक कमाई होने के कारण भी चालक रोडवेज से दूरी बना रहे हैं। हालांकि विभाग का दावा है कि चालकों को 18 हजार रुपये से अधिक वेतन, भत्ते, एक करोड़ रुपये का बीमा, दुर्घटना में मृत्यु पर 7.50 लाख रुपये का मुआवजा और अन्य सुविधाएं दी जा रही हैं, बावजूद इसके हालात सुधरते नजर नहीं आ रहे। अब अधिकारियों को नए सिरे से मंथन करना पड़ रहा है और अगले वर्ष रोजगार मेलों की संख्या बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।

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