शरद कटियार
डिजिटल इंडिया आज केवल एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि देश की प्रशासनिक, आर्थिक और न्यायिक व्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। कंपनी रजिस्ट्रेशन, आयकर रिटर्न, जीएसटी, ई-टेंडर, बैंकिंग और यहां तक कि अदालतों की प्रक्रिया भी अब डिजिटल माध्यम से संचालित हो रही है। इस पूरे तंत्र की पहचान और प्रमाण का आधार है डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC)। लेकिन हाल के वर्षों में डीएससी की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है—क्या डिजिटल सुरक्षा का बोझ अंततः आम नागरिक और छोटे उद्यमी पर ही डाला जा रहा है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि डीएससी कोई साधारण दस्तावेज नहीं, बल्कि व्यक्ति या संस्था की डिजिटल पहचान और कानूनी हस्ताक्षर है। इसी के आधार पर सरकार और न्यायालय यह मानते हैं कि ऑनलाइन किया गया कार्य वास्तविक और वैध है। ऐसे में इसकी सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। बीते वर्षों में फर्जी कंपनियों, जाली टेंडरों और डिजिटल हस्ताक्षरों के दुरुपयोग ने पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए। इसी पृष्ठभूमि में सरकार के अधीन कार्यरत Controller of Certifying Authorities (CCA) ने नियमों को सख्त किया।
इन सख्त नियमों के तहत अब लाइव वीडियो KYC, फेस वेरिफिकेशन, आधार और पैन का क्रॉस-वेरिफिकेशन अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही पहले इस्तेमाल होने वाले साधारण USB टोकन को हटाकर FIPS प्रमाणित हाई-सिक्योरिटी टोकन लागू किए गए हैं। तकनीकी दृष्टि से यह कदम पूरी तरह उचित है, क्योंकि इससे पहचान की चोरी और डिजिटल धोखाधड़ी पर लगाम लगती है। लेकिन सुरक्षा की यह परत जितनी मजबूत हुई, उसकी लागत उतनी ही बढ़ती चली गई।
समस्या केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। डीएससी की वैधता अवधि पहले तीन साल तक होती थी, जिसे घटाकर एक या दो साल कर दिया गया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि उपयोगकर्ताओं को बार-बार डीएससी नवीनीकरण कराना पड़ता है। ऊपर से, डीएससी जारी करने वाली लाइसेंसधारी कंपनियों की संख्या भी घटकर महज आठ रह गई है। प्रतिस्पर्धा कम होने का सीधा अर्थ है—कीमतों पर उपभोक्ता का नियंत्रण कमजोर होना।
हालांकि इस पूरी तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कंपनी रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पहले के मुकाबले बेहद सरल और किफायती हो चुकी है। न्यूनतम पूंजी की बाध्यता खत्म होना, ऑनलाइन प्रक्रिया और कम सरकारी शुल्क ऐसे सुधार हैं, जिन्होंने युवाओं और छोटे कारोबारियों को उद्यमिता की ओर प्रेरित किया है। आज एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कुछ ही दिनों में सीमित खर्च में बनाई जा सकती है। यह सुधार निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है।
लेकिन यहीं एक विरोधाभास भी उभरता है। कंपनी बनाना सस्ता हुआ, मगर उसे चलाने के लिए जरूरी डिजिटल औजार महंगे होते चले गए। डीएससी जैसी अनिवार्य जरूरत अगर आम आदमी की पहुंच से दूर होती जाएगी, तो डिजिटल इंडिया का लाभ केवल बड़े कॉर्पोरेट तक सिमटने का खतरा रहेगा। यह स्थिति उस मूल उद्देश्य के विपरीत है, जिसमें डिजिटल व्यवस्था को समावेशी और सर्वसुलभ बनाने की बात कही गई थी।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और नियामक संस्थाएं सुरक्षा और सुलभता के बीच संतुलन कायम करें। अधिक कंपनियों को लाइसेंस देकर प्रतिस्पर्धा बढ़ाई जा सकती है, कीमतों में पारदर्शिता लाई जा सकती है और छोटे कारोबारियों के लिए रियायती या दीर्घकालिक डीएससी विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
डिजिटल सिस्टम तभी मजबूत होगा, जब वह सुरक्षित होने के साथ-साथ आम नागरिक के लिए सुलभ भी हो। डिजिटल भारत का भविष्य सुरक्षा और सुविधा—दोनों के संतुलन पर टिका है, और यही संतुलन आने वाले समय की सबसे बड़ी कसौटी बनेगा।


