जवाहर सिंह गंगवार
भारतीय परंपरा में मुहूर्त केवल समय नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक अनुशासन का प्रतीक रहा है। शुभ कार्यों से पहले पंचांग देखा जाता है, ग्रह-नक्षत्र मिलाए जाते हैं और फिर निर्णय लिया जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और इसमें जीवन को व्यवस्थित करने की एक कोशिश भी दिखाई देती है। लेकिन जीवन के प्रवाह में कुछ ऐसे सत्य हैं, जो न पंचांग देखते हैं, न घड़ी और न ही किसी ज्योतिषीय गणना की प्रतीक्षा करते हैं। जन्म, मृत्यु और प्रेम—ये तीनों ऐसे अनुभव हैं, जो मुहूर्त से परे हैं और फिर भी जीवन के सबसे गहरे और निर्णायक सत्य हैं।
जन्म किसी शुभ घड़ी का मोहताज नहीं होता। शिशु उसी क्षण संसार में आता है, जब प्रकृति का नियम उसे अनुमति देता है। न मां के गर्भ में पलता जीवन पंचांग पढ़ता है और न ही प्रसव कक्ष में समय को रोका जा सकता है। इसके बावजूद जन्म के बाद समाज उस क्षण को शुभ-अशुभ में बांट देता है, कुंडली बनाता है और भविष्य की गणना करता है। यह विरोधाभास ही जीवन की सच्चाई को उजागर करता है—जीवन की शुरुआत किसी गणना से नहीं, बल्कि स्वाभाविक नियति से होती है। यदि जन्म स्वयं में पवित्र और स्वाभाविक है, तो उसे किसी शुभ मुहूर्त की आवश्यकता क्यों हो?
मृत्यु जीवन का वह सत्य है, जो सभी भेद मिटा देता है। न वह तिथि पूछती है, न नक्षत्र और न ही व्यक्ति की सामाजिक हैसियत। राजा और रंक, ज्ञानी और अज्ञानी—सबके लिए मृत्यु समान है। मृत्यु का कोई मुहूर्त नहीं होता, क्योंकि वह स्वयं समय का अंतिम सत्य है। मृत्यु हमें यह स्मरण कराती है कि मनुष्य का नियंत्रण सीमित है और जीवन का प्रवाह हमारी योजनाओं से कहीं बड़ा है। जिस क्षण यह स्वीकार हो जाता है, उसी क्षण जीवन के प्रति हमारी दृष्टि अधिक विनम्र और संवेदनशील हो जाती है।
यदि जन्म प्रकृति का सत्य है और मृत्यु समय का, तो प्रेम आत्मा का सत्य है। प्रेम न योजना से होता है, न गणना से और न ही किसी अनुकूल समय की प्रतीक्षा करता है। वह अचानक, बिना चेतावनी और बिना शर्त के घटित होता है। समाज प्रेम पर सीमाएं लगाता है—जाति, वर्ग, उम्र, परिस्थिति और यहां तक कि मुहूर्त की भी। लेकिन प्रेम इन सभी बंधनों को अस्वीकार कर देता है। प्रेम का कोई शुभ या अशुभ समय नहीं होता, क्योंकि प्रेम स्वयं में शुभ है। यही कारण है कि प्रेम जीवन को अर्थ देता है और उसे यांत्रिक होने से बचाता है।
वास्तव में मुहूर्त मनुष्य की उस मानसिक आवश्यकता का प्रतीक है, जिसमें वह अनिश्चित भविष्य के सामने सुरक्षा ढूंढता है। समय को शुभ-अशुभ में बांटकर मनुष्य यह मान लेता है कि उसने जोखिम कम कर लिया है। लेकिन जन्म, मृत्यु और प्रेम यह सिखाते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी घटनाएं हमारी योजनाओं से परे घटित होती हैं। इन्हें स्वीकार करना ही परिपक्वता है।
जब हम यह समझ लेते हैं कि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सत्य बिना मुहूर्त के घटित होते हैं, तब हमारे भीतर एक नया साहस जन्म लेता है। हम निर्णय लेने से पहले अत्यधिक भयभीत नहीं होते और जीवन को उसकी स्वाभाविक गति से बहने देते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि परंपराओं का त्याग कर दिया जाए, बल्कि यह कि परंपरा और सत्य के बीच संतुलन बनाया जाए।
अंततः जीवन पंचांग के पन्नों से नहीं, बल्कि सत्य, संवेदना और स्वीकार्यता से संचालित होता है। जन्म बिना पूछे आता है, मृत्यु बिना बताए चली आती है और प्रेम बिना अनुमति के दिल में बस जाता है। यही जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है—जो मुहूर्त से परे है, लेकिन अर्थ से भरी हुई है।
लेखक :वरिष्ठ साहित्यकार और अधिवक्ता हैं।


