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Wednesday, February 11, 2026

आत्ममूल्यांकन से प्रसन्नता, पर-मूल्यांकन से परेशानी

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भरत चतुर्वेदी
“प्रसन्न वह है जो अपना मूल्यांकन करता है, परेशान वह है जो दूसरों का मूल्यांकन करता है”—यह पंक्ति आधुनिक जीवन की सबसे गहरी सच्चाइयों में से एक को उजागर करती है। मनुष्य का मन जितना भीतर की ओर मुड़ता है, उतना ही शांत होता है; और जितना बाहर दूसरों की ओर भटकता है, उतना ही अशांत। सुख और दुख के इस फर्क को समझना ही आत्मिक परिपक्वता की पहली सीढ़ी है।
आत्ममूल्यांकन व्यक्ति को सशक्त बनाता है। जब मनुष्य अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों का निष्पक्ष मूल्यांकन करता है, तो वह अपनी कमियों को स्वीकार करने और अपनी खूबियों को निखारने की दिशा में बढ़ता है। यह प्रक्रिया अहंकार नहीं, विनम्रता सिखाती है। आत्ममूल्यांकन का अर्थ स्वयं को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने का साहस जुटाना है। ऐसा व्यक्ति बाहरी प्रशंसा या आलोचना पर निर्भर नहीं रहता; उसकी प्रसन्नता का स्रोत उसके भीतर होता है।
इसके विपरीत, दूसरों का मूल्यांकन मन को बेचैन करता है। जब हम हर समय यह सोचते रहते हैं कि दूसरा क्या कर रहा है, कितना आगे है या कितना पीछे, तो तुलना जन्म लेती है। तुलना से ईर्ष्या, असंतोष और निराशा पैदा होती है। दूसरों के निर्णयों पर निगाह रखने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपने जीवन से नियंत्रण खो देता है, क्योंकि वह अपनी ऊर्जा सुधार में नहीं, आलोचना में खर्च करता है।
समस्या यह भी है कि हम दूसरों का मूल्यांकन अक्सर अधूरी जानकारी के आधार पर करते हैं। हम किसी की सफलता देखते हैं, उसके संघर्ष नहीं; किसी की मुस्कान देखते हैं, उसका दर्द नहीं। ऐसे अधूरे मूल्यांकन हमारे मन में भ्रम और कड़वाहट पैदा करते हैं। जबकि आत्ममूल्यांकन हमें सच्चाई के करीब ले जाता है, क्योंकि हम अपने भीतर के संघर्ष और सीमाओं से भली-भांति परिचित होते हैं।
आज के सोशल मीडिया के युग में यह अंतर और भी स्पष्ट हो गया है। लोग दूसरों के जीवन का आंकलन तस्वीरों और पोस्टों से करने लगे हैं, जिससे असंतोष और मानसिक तनाव बढ़ रहा है। इस भीड़ में वही व्यक्ति प्रसन्न रह पाता है जो अपनी यात्रा पर ध्यान केंद्रित करता है, न कि दूसरों की दौड़ पर।
अंततः, जीवन की शांति किसी से आगे या पीछे होने में नहीं, बल्कि स्वयं से बेहतर होने में है। जो व्यक्ति रोज़ खुद से सवाल करता है—“मैं आज कैसा इंसान बना?”—वही सच्चे अर्थों में प्रसन्न रहता है। और जो हर समय दूसरों से सवाल करता है—“वह मुझसे आगे क्यों है?”—वह चाहे कितना भी पा ले, भीतर से परेशान ही रहता है।
इसलिए, सुख का सरल सूत्र यही है अपना मूल्यांकन करें, अपनी दिशा सुधारें और दूसरों को उनके हाल पर छोड़ दें। यही प्रसन्नता का स्थायी मार्ग है।

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