संसद पर हुए आतंकी हमले की 24वीं बरसी देश के लिए केवल एक स्मृति दिवस नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन और संकल्प का अवसर भी है। यह वही दिन है जब आतंकवादियों ने भारत की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था को निशाना बनाकर न सिर्फ संसद भवन पर हमला किया, बल्कि देश की संप्रभुता, संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देने का दुस्साहस किया था। उस दिन भारत ने अपने वीर सपूतों को खोया, लेकिन साथ ही यह भी साबित किया कि आतंक के आगे यह राष्ट्र कभी झुकेगा नहीं।
संसद परिसर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा ने एक बार फिर शहीदों के बलिदान को जीवंत कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शहीदों को नमन करना उस राष्ट्रीय भावना का प्रतीक है, जिसमें पूरा देश अपने रक्षकों के प्रति कृतज्ञता से नतमस्तक है। उन्होंने जिस संवेदनशीलता के साथ शहीदों के परिवारों के प्रति सम्मान व्यक्त किया, वह यह दर्शाता है कि राष्ट्र केवल शब्दों में नहीं, बल्कि भावनाओं में भी अपने शहीदों के साथ खड़ा है।
इस श्रद्धांजलि सभा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश राजनीतिक एकता का रहा। सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं की एक मंच पर मौजूदगी ने यह स्पष्ट किया कि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की राजनीति एक स्वर में बोलती है। यह एकता लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है, जो यह बताती है कि विचारधाराओं का मतभेद राष्ट्रहित से ऊपर नहीं हो सकता। आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने का संकल्प तभी मजबूत होता है, जब पूरा देश एकजुट होकर खड़ा हो।
संसद पर हुआ हमला केवल एक आतंकी घटना नहीं था, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक आत्मा पर सीधा प्रहार था। यदि यह हमला सफल हो जाता, तो इसके परिणाम केवल जान-माल की क्षति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि देश की व्यवस्था और आत्मविश्वास को भी गहरी चोट पहुंचती। लेकिन सुरक्षाबलों की सतर्कता, साहस और बलिदान ने इस षड्यंत्र को विफल कर दिया और यह संदेश पूरी दुनिया को गया कि भारत अपनी संस्थाओं और मूल्यों की रक्षा करना जानता है।
आज, जब हम इस घटना के 24 वर्ष पूरे होने पर शहीदों को नमन कर रहे हैं, तो यह जरूरी है कि हम केवल अतीत को याद न करें, बल्कि वर्तमान और भविष्य के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी समझें। आतंकवाद के स्वरूप बदल रहे हैं—कभी सीमा पार से, कभी वैचारिक रूप में, तो कभी डिजिटल माध्यमों से। ऐसे में राष्ट्र को सजग, एकजुट और मजबूत बने रहना होगा।
शहीदों का बलिदान हमें यह सिखाता है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल बंदूक से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक, मजबूत संस्थाएं और राष्ट्रीय एकता से होती है। संसद पर हुए आतंकी हमले की बरसी पर लिया गया यह संकल्प कि भारत आतंकवाद के खिलाफ कभी समझौता नहीं करेगा, ही उन शहीदों के प्रति सच्ची और स्थायी श्रद्धांजलि है।






