उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और सत्ता के समीकरण अक्सर सवालों के घेरे में रहे हैं, लेकिन पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी ने इन बहसों को एक बार फिर तेज कर दिया है। देवरिया इंडस्ट्रियल प्लॉट घोटाले का मामला 1999 का है — यानी 26 साल पुराना। इस अवधि में लगभग 10 मुख्यमंत्री बदल चुके, प्रशासनिक संरचना कई बार उलट-पुलट हो चुकी, नीतियां बदलीं, प्राथमिकताएं बदलीं… लेकिन यह केस जैसे समय की धूल में दबा पड़ा था।
अब जब इस मामले में अचानक गिरफ्तारी होती है, तो सवाल उठना लाज़मी है क्या यह केवल न्यायिक प्रक्रिया है, या सत्ता की राजनीति इसकी दिशा तय कर रही है?
अमिताभ ठाकुर के गंभीर आरोप: “मुख्यमंत्री योगी मुझे मरवा सकते हैं”गिरफ्तारी के दौरान अमिताभ ठाकुर का बयान”मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुझे किसी भी दिन मरवा सकते हैं”
सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि राज्य की सत्ता पर सीधा हमला है। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी जब इस स्तर का आरोप लगाता है, तो मामला सामान्य नहीं रह जाता। यह राज्य के माहौल, सरकारी संस्थाओं की निष्पक्षता और व्यक्ति की सुरक्षा—तीनों पर प्रश्न खड़ा करता है।
इस मामले की समयरेखा खुद कई बातें कहती है,1999 में मामला जन्मा।
कई मुख्यमंत्रियों का दौर रहा कल्याण सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक
लेकिन इतने वर्षों में कोई ठोस कार्रवाई नहीं,
अचानक 2025 में मामला तेज़, और गिरफ्तारी,कानून कहता है कि अपराध का समय नहीं देखा जाता, लेकिन जब कार्रवाई सत्ता के आलोचक पर हो, और वह भी इतने समय बाद—तो जनता सवाल पूछती है:
क्या यह न्याय है या राजनीतिक प्रतिशोध?
अमिताभ ठाकुर उन अधिकारियों में रहे हैं जो सरकारों के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते रहेकई बड़े नेताओं पर आरोप लगाते रहे,प्रशासनिक विसंगतियों पर मुखर रहे सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहे।
उनकी यह आक्रामक शैली कई सरकारों को असुविधाजनक लगती रही।लेकिन मौजूदा सरकार के संदर्भ में यह सवाल और बड़ा हो जाता है क्या अमिताभ ठाकुर की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है?
यह कहना जल्दबाज़ी होगा कि सरकार “दबाव” में है, लेकिन इन बिंदुओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि,अमिताभ ठाकुर एक पहचान वाला नाम हैं, उनकी पत्नी नूतन ठाकुर भी एक्टिविस्ट हैं,उनके आरोप मीडिया में तुरंत सुर्खियां बनते हैं, विपक्ष उनकी गिरफ्तारी को मुद्दा बना सकता है,मानवाधिकार और रिटायर्ड अफसरों के संगठन भी सक्रिय हो सकते हैं,केस का 26 साल पुराना होना सरकार की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
इन कारणों से सरकार यदि रक्षात्मक दिखाई देती है, तो यह स्वाभाविक है।
कानून कहता है कि अपराध के मामले में समय मायने नहीं रखता, लेकिन राजनीति कहती है कि समय का चयन ही सबसे बड़ा संदेश होता है।अगर 26 साल तक यह मामला फाइलों में दबा था,और अचानक एक बेबाक आलोचक पर कार्रवाई होती है,और उसी समय वह मुख्यमंत्री पर हत्या करवाने का आरोप लगाता है…
तो यह केवल “संजोग” नहीं लगता।
लोकतंत्र में सत्ता से बड़ा कोई नहीं—लेकिन सवालों से बड़ी भी कोई सत्ता नहीं होती।अमिताभ ठाकुर की गिरफ्तारी और उनके लगाए भयावह आरोपों ने एक बार फिर यह बहस जगा दी है कि
क्या यूपी में कानून अपना रास्ता चला रहा है,या सत्ता का रास्ता कानून को मोड़ रहा है?
मुख्यमंत्री पर लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं।सरकार को न केवल कानून की प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए,बल्कि यह भी बताना होगा कि एक पूर्व आईपीएस क्यों खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है।
लोकतंत्र में पारदर्शिता ही सरकार की सबसे बड़ी ढाल होती है।






