क्योंकि भारत की आज़ादी और संविधान की रचना पत्रकारों की कलम से ही शुरू हुई
भारत में पत्रकारिता को अक्सर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन यदि इतिहास की धूल हटाकर सच्चाई देखी जाए, तो पता चलता है कि भारत के लोकतंत्र की नींव ही पत्रकारिता पर टिकी हुई है। हम चौथा नहीं, पहला स्तंभ हैं, क्योंकि देश को आज़ाद कराने से लेकर संविधान लिखने और राष्ट्र की दिशा तय करने तक, सबसे आगे एक पत्रकार ही खड़ा था। यह कोई भावनात्मक दावा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य है। आइए एक-एक तथ्य को प्रमाणों सहित समझें।नेताजी सुभाष चंद्र बोस — आज़ादी से पहले मीडिया संस्थान के संस्थापक थे।
नेताजी केवल एक क्रांतिकारी नेता नहीं थे, वे गहन बौद्धिक क्षमता वाले पत्रकार भी थे।उन्होंने आज़ादी के संघर्ष में मीडिया को हथियार बनाया। नेताजी द्वारा चलाए गए प्रमुख पत्र मे फ़ॉरवर्ड, कोलकाता से नेशन, कांग्रेस की नीतियों का विश्लेषण,आज़ाद हिन्द, सिंगापुर से, आईएनए का मुखपत्र नेताजी का मानना था कलम बंदूक से अधिक ताकतवर है।उनकी पत्रकारिता ने देशभर में क्रांति की चेतना जगाई।जवाहरलाल नेहरू — देश के प्रथम प्रधानमंत्री, परंतु पहले पत्रकार थे।
बहुत कम लोग जानते हैं कि नेहरू जी एक महान लेखक और पत्रकार रहे। उन्होंने जेल में रहते हुए भी लेखन और संपादन नहीं छोड़ा। नेहरू द्वारा संपादित व प्रकाशित पत्र नेशनल हेराल्ड- 1938 में स्थापित (आज भी कांग्रेस का प्रमुख अख़बार माना जाता है) वे मानते थे स्वतंत्र प्रेस के बिना स्वतंत्रता अधूरी है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति और विशिष्ट पत्रकार थे। राजेंद्र प्रसाद जी वकील, स्वतंत्रता सेनानी और साथ ही फुल-टाइम पत्रकार भी थे। राजेंद्र प्रसाद द्वारा संपादित/चालित पत्रिकाएं जिनमे देश, देशभक्ति और सामाजिक सुधार पर केंद्रित सर्चलाइट,इंडिया शामिल हैं।
राजेंद्र बाबू ने बिहार में पत्रकारिता को स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य आधार बनाया।बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर — संविधान निर्माता और क्रांतिकारी पत्रकार थे. बाबा साहेब पत्रकारिता को सामाजिक क्रांति का माध्यम मानते थे।उन्होंने दलितों, मजदूरों और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए कई पत्रिकाएं निकालीं। अंबेडकर जी द्वारा प्रकाशित प्रमुख पत्रिकाएं – मूकनायक, 1920 बहिष्कृत भारत, 1927,जनता, 1930,प्रबुद्ध भारत, 1956 इन पत्रिकाओं ने भारत के सामाजिक ढांचे को बदलने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। बापू महात्मा गांधी पत्रकारिता को सत्य का धर्म मानने वाले राष्ट्रपिता।
महात्मा गांधी केवल स्वतंत्रता के महान नेता नहीं, बल्कि भारत के इतिहास के सबसे प्रभावशाली पत्रकार भी थे। उन्होंने 40 वर्षों तक लगातार पत्रकारिता की और कई अखबार चलाए। महात्मा गांधी द्वारा संपादित/चालित प्रमुख अखबार इंडियन ओपिनियन, दक्षिण अफ्रीका, 1903,यंग इंडिया), 1919,नवजीवन 1919,हरिजन, 1933 गांधी जी का सिद्धांत था पत्रकारिता का उद्देश्य सत्य की खोज और जनसेवा है। गांधी जी ने कभी अपने अखबारों का विज्ञापन तक नहीं लिया।
उनके लिए प्रेस आंदोलन का नैतिक केंद्र था। नेता / स्वतंत्रता सेनानी क्या थे? कौन-कौन से पत्र/ पत्रिकाएं चलाईं नेताजी सुभाष चंद्र बोस पत्रकार, संपादक फॉरवर्ड, नेशनल, आज़ाद हिन्द। जवाहरलाल नेहरू पत्रकार, लेखक नेशनल हेराल्ड डॉ. राजेंद्र प्रसाद पत्रकार, संपादक सर्चिंलाइट, देश, इंडिया डॉ. भीमराव अंबेडकर पत्रकार, समाज सुधारक मूकनायक, बहिष्कारित भारत, जनता महात्मा गांधी पत्रकार, संपादक इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया, नवजीवन, हरिजन जब देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी, तो सबसे आगे कौन था? पत्रकार।जब संविधान लिखा जा रहा था,तो लेखनी किसकी थी? एक पत्रकार (डॉ. अंबेडकर)। जब जनजागरण की मशाल जलाई गई,तो हाथ किसका था? एक पत्रकार (महात्मा गांधी)। जब देश का नेतृत्व बदल रहा था, तो कलम किसकी आवाज़ थी? नेहरू, बोस, राजेंद्र प्रसाद सभी पत्रकार।
इसलिए यह कहना कि पत्रकार चौथा स्तंभ हैं,इतिहास के साथ अन्याय है।क्योंकि लोकतंत्र की शुरुआत ही कलम से हुई थी,और आज भी सत्ता को आईना दिखाने का काम सबसे पहले पत्रकार ही करता है। जिस देश की आज़ादी के नायक, संविधान के निर्माता और प्रथम प्रधानमंत्री सभी पत्रकार रहे हों, उस देश में पत्रकार चौथा नहीं, बल्कि पहला स्तंभ हैं। पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, राष्ट्रनिर्माण की सबसे पुरानी और प्रमाणित विद्यालय है। सत्ता बदलती है, सरकारें गिरती हैं, लेकिन पत्रकारिता की मशाल कभी बुझती नहीं क्योंकि वही लोकतंत्र की पहली सांस है।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के संस्थापक हैं)






